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सोमवार, 25 दिसंबर, 2006 को 09:22 GMT तक के समाचार

सुशील झा
बीबीसी संवाददाता, हाजीपुर

हाजीपुर में केला है तो जीवन है

हाजीपुर के किसानों के लिए केला केवल एक फल नहीं बल्कि जीविका का सबसे बड़ा साधन है और अपने बेहतर भविष्य के लिए उन्हें अगर किसी चीज़ पर भरोसा है तो वो है केला.

असल में हाजीपुर में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यहाँ से भारी मात्रा में केला आसपास के राज्यों में निर्यात किया जाता है.

पूजा में इस्तेमाल होने वाला छोटा पीला केला यहीं की पैदावार है जिसे यहाँ चीनिया केला कहते हैं.

पटना से हाजीपुर के रास्ते में गंगा नदी के पुल से केले के खेतों का नज़ारा स्पष्ट दिखता है. जहाँ तक नज़र जाती है केले ही केले.

किसान राजा राय बताते हैं कि न केवल चीनिया बल्कि पूरे क्षेत्र में महाभोग, गठिया मुठिया जैसी केले की कई और प्रजातियों की खेती होती है.

किसानों का कहना है कि केले ने उनकी पूरी ज़िंदगी बचा ली है. किसान राजू पहलवान कहते हैं कि पिछले तीन वर्षों से इलाक़े में सूखा पड़ा है जिसके कारण धान की खेती संभव नहीं. केला बोरिंग के पानी के ज़रिए आसानी से उगाया जा सकता है और यह ठीक-ठाक आय दे देता है.

लेकिन किसानों को सरकार से शिकायतें हैं. वो चाहते हैं कि केला उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए ताकि दक्षिण भारत के राज्यों की तरह बिहार भी केले के ज़रिए थोड़ी प्रगति कर ले.

किसान श्याम प्रसाद कहते हैं कि केले का फल ही नहीं पूरा पेड़ ही फ़ायदेमंद है. वो कहते हैं, "केले का पत्ता मवेशी खा सकता है. इसके तने से रेशा निकलता है जिससे कपड़ा बन सकता है और भी कई चीज़ें बनती है. इससे खाद भी बनाया जा सकता है और हमने सुना है कि इससे डाई भी बनाया जाता है."

केले के रेशे की बात समझ में नहीं आई . इसके बारे में पता करने पर मालूम हुआ कि हाजीपुर केला अनुसंधान केंद्र में केले के तनों से रेशा निकाला जाता है और इससे कई प्रकार की सामग्री बनाई जाती है.

सामान

अनुसंधान केंद्र की अधिकारी वीणा साही ने हमें केले के रेशे से बनी टोपियाँ, बैग, सजावटी सामान दिखाया जिन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये केले के रेशे का बना है. देखने में बिल्कुल जूट या पटसन की तरह दिखने वाला रेशा वाकई खूबसूरत था.

उनका कहना था कि अगर सरकार समर्थन दे तो केले से कपड़ा बनाने की तकनीक के आधार पर उद्योग लगाना हाजीपुर में आसान है.

केंद्र के वरिष्ठ अधिकारी पंचम सिंह का कहना था, "हमारे पास सबकुछ है. बस मार्केटिंग नहीं हो पा रही है ठीक से. सरकार समर्थन दे रही है और हम कोशिश कर रहे हैं कि अगले एक दो-वर्षो में बड़ा कारखाना न सही तो कुटीर उद्योग के स्तर पर ही केले के रेशे से बनी चीज़ों का उत्पादन संभव हो."

हालाँकि किसानों को केले के रेशे के बारे में अभी भी जानकारी कम है लेकिन एक बात तय है कि अगर केले पर आधारित उद्योग शुरू होगा तो केला उगाने वाले किसानों को फ़ायदा ज़रूर होगा.

केले के ज़रिए अपना भविष्य सुधरने का सपना हाजीपुर के किसान और आम लोग कई सालों से देख रहे हैं. यह सपना कब पूरा होगा. कम से कम बिहार में कहना मुश्किल है लेकिन तब तक केले के रेशों से बना सामान न सही केला खाकर स्वस्थ तो रहा ही जा सकता है.