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गुरुवार, 21 दिसंबर, 2006 को 12:56 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

महावत को मिला हाथी की मौत का मुआवजा

जानवर के साथ व्यवहार और उसकी संवेदना को लेकर अक़्सर बहस होती रही है लेकिन अब राजस्थान में एक अदालत ने कहा है कि हाथी भी इंसान की तरह जीवंत प्राणी है.

हाईकोर्ट ने एक हथिनी की दुर्घटना में हुई मौत के मुआवजे के दावे का निर्णय सुनाते हुए कहा कि हाथी भी इंसान के समकक्ष हैं.

हाथी मालिकों की संस्था ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत किया है.

अदालत के फ़ैसले का पालन करते हुए बीमा कंपनी ने हथिनी बबली की 18 साल पहले सड़क दुर्घटना में हुई मौत के बदले महावत सादिक को मुआवज़े के रूप में छः लाख रूपये का चेक दिया है.

हालाँकि बीमा कंपनी इस निर्णय पर अपील का विचार कर रही है लेकिन महावत फ़ैसले से बहुत खुश है.

जयपुर के आमेर में विदेशी सैलानियों को सवारी करा रही बबली को 12 अक्तूबर 1988 के दिन विपरीत दिशा से आ रही जीप ने टक्कर मार दी थी.

इस हादसे में बबली के आगे के दोनों पैर टूट गए. तीन दिनों तक दर्द से कराहने के बाद बबली की मौत हो गई.

इस दौरान महावत सदीक ने उसकी खूब सेवा की.

मुआवजा

सदीक के दावे पर मोटर दुर्घटना अदालत ने 1993 में बीमा कंपनी को दो लाख 90 हज़ार रुपये और 12 फ़ीसदी सालाना ब्याज अदा करने को कहा.

बीमा कंपनी ने इस फ़ैसले के खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की थी.

बीमा कंपनी का कहना था कि मोटर वाहन अधिनियम में पशुधन होने के नाते उसकी जिम्मेदारी दो हज़ार रुपए से ज़्यादा नहीं है.

सदीक के वकील जीके भारतीय का कहना था कि हाथी इंसान की तरह काम करता है और वो महावत के निर्देशों का पालन करता है.

उसमें चीजों को पहचानने की शक्ति है. उसका आचरण इंसानी व्यवहार के बहुत निकट है. इसलिए उसे संपत्ति मानना ठीक नहीं होगा. वह सदीक के परिवार के कमाऊ सदस्य की तरह था.

हेल्प इन सफरिंग संस्था के साथ हाथियों पर काम कर रहे डॉ मधु लाल को हाथियों के व्यवहार का अच्छी ख़ासा ज्ञान है.

वे कहते हैं, “ हाथी एक भावुक प्राणी है. यह समूह में रहता है. अपने परिवार के साथ रहता है. इनमें हथिनी परिवार की मुखिया होती है. वह अपने बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण करती है. हाथियों में गहरी संवेदना का भाव होता है.”

जयपुर में रियासत काल से हाथियों को शाही लाव लश्कर के साथ रखा जाता था. वक्त बदला और आज हाथी आमेर किले पर पर्यटकों को सवारी मुहैया कराते हैं.

अभी जयपुर में करीब एक सौ हाथी हैं. हाथी मालिकों की संस्था का कहना है कि अदालत के इस निर्णय से उन्हें बड़ी मदद मिलेगी.

आज यदि गजराज जिंदा होते तो शायद यही कहते अदालत तेरा एहतराम.