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शनिवार, 16 दिसंबर, 2006 को 19:47 GMT तक के समाचार

पीएम तिवारी
कोलकाता से

सारे राम एक ही गाँव में!

एक बहुत पुरानी कहावत है कि नाम में क्या रखा है? लेकिन पश्चिम बंगाल में बांकुड़ा ज़िले के रामपाड़ा गाँव में यह कहावत एकदम ग़लत साबित होती है.

यहां नाम में ही सब कुछ रखा है. राम से शुरू होने वाले इस गाँव की ख़ासियत यही है कि यहाँ सभी पुरुषों के नाम राम से ही शुरू होते हैं.

रामलाल, रामजय, रामलाल, रामदीन, रामअवतार और रामबिहारी, राम से जितने भी नाम गिनाए जा सकते हैं वे सब इस गाँव में मौजूद हैं.

लेकिन यह कोई नहीं जानता कि यह परंपरा कब से शुरू हुई. यह और बात है कि इस ख़ासियत ने ही रामपाड़ा को पूरे ज़िले में एक अलग पहचान दे दी है.

इस गांव के रामलोचन मंडल कहते हैं,'' यह दिलचस्प परंपरा कब से शुरू हुई, इसकी हमें पक्की जानकारी नहीं है. लेकिन हमने अपने बुजुर्गों से इस बारे में जो सुना है, उसके मुताबिक हम लोग भगवान राम की संतान हैं.''

वो कहते हैं,'' हमारे पूर्वजों के नाम भी राम से थे. इसलिए हमने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया है.''

फिलहाल पांच सौ की आबादी वाले इस गांव में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं है जिसका नाम राम से नहीं शुरू होता हो.

इसी गांव के रामजय मुखर्जी कहते हैं कि शायद यह परंपरा गांव के बाहर स्थित राम के मंदिर की वजह से शुरू हुई होगी. हमने इस बारे में ज्यादा जानने की कोशिश नही की.

राम का नाम

लेकिन आखिर जब हर नाम राम से ही शुरू होता है तो गाँववालों या बाहरी लोगों को कितनी परेशानी होती होगी?

रामशंकर बनर्जी कहते हैं कि ऐसा नहीं है. हमें इससे कोई परेशानी नहीं होती. हाँ, यह ज़रूर है कि हमें हर व्यक्ति को उसके पूरे नाम से पुकारना पड़ता है.

वो कहते हैं कि हम गांव के हर व्यक्ति को उसके पूरे नाम से बुलाते हैं. लेकिन हमारे लिए यह कोई समस्या नहीं है.

रामशंकर बनर्जी कहते हैं कि हमें इस बात का गर्व है कि नाम के मामले में हम दूसरे गाँवों के लोगों से अलग हैं और नामकरण की हमारी अपनी अनूठी परंपरा है.

रामकुमार चटर्जी की पत्नी रीता कहती है कि एक जैसे नामों के चलते कई बार स्कूल या ब्लाक कार्यालय में पति का नाम लिखाते समय अजीब स्थिति पैदा हो जाती है. शादी के बाद तो मुझे ही बड़ा अजीब लगता था. लेकिन अब आदत हो गई है.

रामपाड़ा गांव के सबसे बुजुर्ग रामकृष्ण मुखर्जी कहते हैं कि हमें अपनी इस अनूठी परंपरा पर गर्व है. लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ी आबादी को ध्यान में रखते हुए यह कहना मुश्किल है कि हम कब तक इस परंपरा को निभा सकते हैं.

वो कहते हैं,'' हमारे बुजुर्गों ने जब यह परंपरा शुरू की थी तब इस गांव की आबादी बहुत कम थी. लेकिन अब आबादी इतनी बढ़ गई है कि नामों का टोटा पड़ने लगा है. जल्दी ही ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि इस छोटे से गांव में एक ही नाम के कई व्यक्ति हो जाएंगे. इससे भ्रामक स्थिति पैदा हो जाएगी.''

उनको आशंका है कि भविष्य में राम से नाम शुरू करने की परंपरा तोड़नी होगी.

बांकुड़ा के इतिहास पर शोध करने वाले अरविंद चटर्जी कहते हैं कि बंगाल में कोई दूसरा ऐसा गाँव नहीं है जहां ऐसा परंपरा हो. शायद यह देश में अपने तरह की पहली परंपरा है.

वैसे अगर यह परंपरा जारी रही तो आने वाले दिनों में शायद इस गाँव के किसी व्यक्ति का पता लगाने के लिए उसके पिता और दादा का भी पूरा नाम जानना ज़रूरी होगा.