गुरुवार, 14 दिसंबर, 2006 को 01:23 GMT तक के समाचार
आलोक प्रकाश पुतुल
बिलासपुर
नक्सली हमलों से परेशान दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने रेलगाड़ियों में गश्त करने वाले रेलवे सुरक्षा बल के जवानों से हथियार वापस लेने का निर्णय लिया है.
अब ये जवान निहत्थे ही रेल गाड़ियों में सवार हज़ारों लोगों की सुरक्षा करेंगे.
रविवार को टाटानगर-खड़गपुर रेल मार्ग पर यात्री गाड़ी को कब्ज़े में लेकर रेलवे सुरक्षा बल के जवानों से हथियार लूटने की घटना के बाद यह निर्णय लिया गया है.
इसी दिन नक्सलियों ने महाराष्ट्र के गोंदिया के पास एक मालगाड़ी के इंजन में भी आग लगा दी थी.
वैसे इससे पहले भी समय-समय पर नक्सली रेलगाड़ियों को अपना निशाना बनाते रहे हैं.
रेलवे प्रशासन का तर्क है कि नक्सलियों के निशाने पर हमेशा इन रेलगाड़ियों में गश्त लगाने वाले पुलिस के जवान होते हैं, जिनके पास अत्याधुनिक हथियार होते हैं.
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अंकुश गुप्ता कहते हैं, "नक्सलियों के आरपीएफ जवानों से हथियार लूटने की घटना के बाद बाध्य होकर यह निर्णय लेना पड़ा."
डिवीज़नल सिक्यूरिटी कमिश्नर कमांडेंट एम एल राम का कहना था कि रेलगाड़ियों में गश्त करने वाले तीन-चार जवानों को हथियार देना ख़तरे से खाली नहीं है.
उनका कहना है, "नक्सली हमेशा सैकड़ों की संख्या में आते हैं और तीन-चार जवानों के लिए यह संभव नही है कि वे उनका मुकाबला कर सकें."
बढ़ता प्रभाव
माओवादी भारत के 13 राज्यों में सक्रिय हैं. लेकिन पिछले एक वर्ष में जितने लोग माओवादी गतिविधियों की वजह से मारे गए हैं, उनमें से 40 प्रतिशत हत्याएँ छत्तीसगढ़ में हुई हैं.
पिछले डेढ़ साल से छत्तीसगढ़ में नक्सलवादी हिंसा की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है. सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक सौ से अधिक पुलिसकर्मियों समेत 470 लोग नक्सलवादी हमलों में मारे गए हैं.
कुछ लोगों का तर्क है कि इस राज्य में माओवादियों के हमले में आई तेज़ी की एक वजह यहाँ पिछले कुछ समय से राज्य सरकार की ओर से माओवादियों के ख़िलाफ़ चलाया जा रहा अभियान है.
यह अभियान, 'सलवा जुड़ूम' नाम से चलाया जा रहा है जिसमें राज्य सरकार ने पुलिस और आम लोगों की भागीदारी से माओवादियों से निपटने की रणनीति बनाई है.
नक्सलवादियों का कहना है कि राज्य सरकार ने 'सलवा जुड़ुम' के बहाने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है और वे इसका विरोध कर रहे हैं.
नक्सलवादियों के विरोध के बाद बस्तर, दंतेवाड़ा और कांकेर ज़िले के 60 हज़ार आदिवासी अपना घर-बार छोड़ कर सरकार द्वारा चलाए जा रहे राहत शिविरों में रह रहे हैं.