मंगलवार, 12 दिसंबर, 2006 को 17:29 GMT तक के समाचार
बीनू जोशी
बीबीसी संवाददाता
भारत प्रशासित कश्मीर में अस्सी के दशक से जारी अलगाववादी आंदोलन के कई तरह के असर समाज पर दिखाई देते हैं.
इसके असर से वन्य जीव भी अछूते नहीं बचे हैं. अस्सी के दशक के बाद से यहाँ वन्य जीवों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है.
जम्मू कश्मीर के चीफ़ वाइल्ड लाइफ़ वार्डन नसीर अहमद कछलू के अनुसार जानवरों और पक्षियों की संख्या में बीस से साठ फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.
इनका कहना था कि वन्य जीवों की संख्या में वृद्धि की वजह बिल्कुल सीधी है.
क्षेत्र में चरमपंथी गतिविधियाँ बढ़ने पर प्रशासन ने लोगों से कहा कि वे अपने हथियार पुलिस के पास जमा कर दें ताकि इसका नाजायज़ इस्तेमाल रोका जा सके.
दूसरी तरफ़ कोई भी अब इस डर से जंगलों में जाने की हिम्मत नहीं करता कि वह सुरक्षा बलों और चरमपंथियों के बीच होने वाली फ़ाइरिंग की चपेट में न आ जाए.
इसका परिणाम यह हुआ कि इन वर्षों के दौरान जंगली जानवरों का शिकार एक दम न के बराबर हुआ.
संख्या बढ़ी
नसीर कछलू का कहना था कि ये जंगली जानवर ख़ास तौर पर चीते, बर्फ़ानी चीते, हिंगोल(एक ऐसा जानवर जो सिर्फ़ कश्मीर में ही पाया जाता है), स्पाडिड,(धब्बों वाला), हिरण और पक्षियों के लिए एक अच्छी ख़बर है.
लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि दूसरी तरफ़ कुछ जानवरों की संख्या में इज़ाफ़े के कारण कुछ हानि भी उठानी पड़ी है.
इन दिनों रीछों की संख्या में वृद्धि के कारण लोगों पर रीछों का हमला बढ़ा है.
नसीर कछलू ने कहा कि जहाँ 1990 में हिंगोलों की संख्या 120 के आसपास थी वह अब बढ़ कर 250 से भी ज़्यादा हो गई है.
इसी तरह चीतों की संख्या में भी काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है. हिरणों की संख्या में भी काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. इस अवधि में हिरणों की संख्या 250 से बढ़ कर लगभग ढाई हज़ार के क़रीब पहुँच गई है.
उनका कहना था कि जंगली जानवरों की तो बाक़ायदा गिनती नहीं होती लेकिन वैज्ञानिक तरीक़ों से इसकी संख्या निर्धारित की जाती है.
इनका कहना था कि पक्षियों की संख्या पता लगाना तो और मुश्किल है लेकिन काले तीतरों और फे़जेंटिस की संख्या में पचास फ़ीसदी तक वृद्धि हुई है.