रविवार, 10 दिसंबर, 2006 को 13:52 GMT तक के समाचार
सुशील झा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा ने भारत-अमरीका परमाणु संधि का कड़ा विरोध किया है और कहा है कि इस संधि में जिस तरह की शर्तें रखी गई हैं वो भारत सरकार को स्वीकार नहीं करनी चाहिए.
अमरीकी संसद के दोनों सदनों में पारित इस विधेयक के बारे में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की रविवार को बैठक हुई जिसमें तय किया गया कि संसद में इस पर बहस की भी मांग की जाएगी.
पार्टी का कहना है कि इस संधि से न केवल भारत का पूरा परमाणु कार्यक्रम अमरीका की निगरानी में आ जाएगा बल्कि भारत को परमाणु परीक्षण से जुड़ी ऐसी शर्ते माननी पड़ेंगी जो व्यापक परमाणु अप्रसार संधि (सीटीबीटी) की शर्तों से भी कड़ी हैं.
पार्टी का कहना है कि संधि के तहत भारत किसी भी प्रकार के परमाणु परीक्षण नहीं कर पाएगा.
पार्टी ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया और कहा कि इसकी शर्तें स्वीकार करने योग्य नहीं है.
शर्तों पर आपत्ति
भाजपा नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा का कहना था," हमारे परमाणु रिएक्टरों को लगातार परमाणु ईंधन मिलने की गारंटी इसमें नहीं है. यहाँ तक कि हम अपने बचे हुए परमाणु ईंधन की रिप्रोसेसिंग नहीं कर सकते."
उन्होंने कहा, "संधि के तहत परमाणु पदार्थों के उत्पादन पर भी रोक होगी. इसमें संधि से पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है और अग़र हम स्वीकार करने के बाद पीछे हटते हैं तो परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले देशों के समूह (एनएसजी) का कोई देश हमें परमाणु ईंधन या रिएक्टर किसी चीज़ में मदद नहीं करेगा."
यशवंत सिन्हा ने यहाँ तक कहा कि यह संधि भारत की विदेश नीति को भी प्रभावित करती है.
उनका कहना था, "संधि कहती है कि भारत की विदेश नीति विभिन्न मुद्दों पर अमरीकी विदेश नीति से मेल खानी चाहिए. संधि में तीन स्थानों पर ईरान के ख़िलाफ़ वोट डालने के लिए हमारी तारीफ़ हुई है. क्या ये विदेश नीति के साथ समझौता नहीं होगा."
पार्टी ने कहा कि सरकार को यह संधि ख़ारिज़ कर देनी चाहिए और वो इस मुद्दे पर संसद में बहस की माँग भी करेंगे.
विरोध
उनका कहना था," हम उम्मीद करते हैं कि कल-परसों में सरकार इस पर संसद में बयान दे. हम उनकी बात सुनेंगे और माँग करेंगे कि संसद के दोनों सदनों में बहस हो. हम चाहते हैं कि सरकार इस संधि को ख़ारिज़ कर दे क्योंकि ये शर्तें भारत के भविष्य को पंगु बनाती हैं."
भाजपा के कार्यकाल में ही अमरीका के साथ सामरिक भागीदारी के विभिन्न पहलुओं के तहत परमाणु संधि किए जाने पर विचार विमर्श शुरू हुआ था लेकिन अब पार्टी का रुख़ कड़ा है.
एक समय अमरीका के साथ अच्छे रिश्तों की दुहाई देने वाली पार्टी आज उसी की शर्तों का विरोध कर रही है.
पार्टी के कड़े रुख को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में संसद में इस मुद्दे पर हंगामा हो सकता है और सरकार को एक बार फिर या तो बयान देना पड़ेगा या फिर बहस के लिए सहमत होना पड़ेगा.