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गुरुवार, 07 दिसंबर, 2006 को 15:58 GMT तक के समाचार

अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

'समझौता तय शर्तों पर होने की उम्मीद'

अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने उम्मीद जताई है कि भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए कांग्रेस के सामने जो विधेयक पेश होगा वो राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुए समझौते के सिद्धातों के अनुरुप ही होगा.

अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स की तीन दिन की भारत यात्रा के दौरान अटकलों का बाज़ार गर्म था कि वो अमरीका और भारत के बीच परमाणु समझौते को अमरीकी संसद में पारित कराने की दिशा में जो प्रयास हो रहे हैं उस पर क्या ख़बर लाते हैं.

आज दिल्ली में भारतीय विदेश सचिव शिव शंकर मेनन के साथ एक पत्रकार सम्मेलन को संबोधित करते हुए बर्न्स ने कहा है कि आने वाले 36 घंटों के भीतर परमाणु समझौते को क़ानूनी शक्ल देने वाला विधेयक अमरीकी संसद के सामने पेश कर दिया जाएगा.

यह विधेयक अमरीकी सीनेटे और हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव में पारित दो विधेयकों के प्रावधानों को मिला कर बनाया गए विधेयक का अंतिम मसौदा है.

इसे अमरीकी संसद को बिना संशोधन के पारित या ख़ारिज करना है. जो सवाल भारतीय प्रसार माध्यमों में बार बार उठ रहा है वो है कि क्या इस विधेयक में ऐसी शर्तें लादी जाएंगी जिसका बुश-मनमोहन सिंह समझौते में कोई ज़िक्र नहीं था?

उम्मीद

पत्रकार सम्मेलन के दौरान सवालों का जवाब देते समय निकोलस बर्न्स काफ़ी आशावान लग रहे थे और उन्होंने कहा कि पिछले 18 महीनों में इस समझौते को कायम रखने के लिए दोनों पक्षों की ओर से काफ़ी मेहनत की गई है और मुश्किल दौर ख़त्म हो चुका है. लेकिन जब यह विधेयक पारित होगा क्या तब भी यही बात कही जा सकेगी.

क्या अमरीका भारत के परमाणु संयंत्रों में इस्तेमाल हो चुके ईंधन को वापस लेगा या उसे इसके दोबारा इस्तेमाल की तकनीक उपलब्ध कराएगा जैसा कि बुश मनमोहन समझौते में तय था.

दूसरी अहम बात कि क्या अमरीका भारत को परमाणु ईंधन की निर्बाध आपूर्ति की गारंटी देगा? निकोलस बर्न्स ने कहा कि उन्होंने विधेयक का अंतिम मसौदा नहीं देखा है मग़र उम्मीद है अमरीकी संसद से निराशा नहीं होगी.

बर्न्स कह रहे थे कि अब तक भारत के साथ परमाणु समझौते के प्रति अमरीकी संसद के दोनों सदनों का रुख सकारात्मक रहा है और वो उम्मीद करते हैं कि विधेयक का अंतिम मसौदा दो देशों के नेताओं के बीच हुए समझौते के अनुरूप ही होगा.

उन्होंने उम्मीद जताई कि समझौते के अनुसार भारतीय परमाणु भट्टियों को ईंधन सप्लाई की गारंटी भी उसमें शामिल होगी.

मग़र भारत सरकार और वैज्ञानिकों को चिंता यह है कि क्या इस विधेयक में ऐसी शर्तें जोड़ी जाएंगी जिन्हें स्वीकार करना भारत के लिए संभव नहीं होगा. अगर ऐसी नौबत आती है तो क्या भारत और अमरीका के संबंध जो ऊँचाइयाँ छूने की कोशिश कर रहा है वहां से फ़िसल सकते हैं.

मजबूत संबंध

अमरीकी विदेश उपमंत्री ने कहा कि अमरीका और भारत के संबंध बहुत मज़बूत हैं और भविष्य में भी मज़बूत रहेंगे.

उन्होंने कहा, "दरअसल जब भी ऐसी कोई ऐतिहासिक शुरुआत होती है तो कुछ तबकों की तरफ़ से उसकी आलोचना भी होती है. लेकिन यह लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है. मुझे पूरा विश्वास है भारत और अमरीका के संबंध भविष्य में और मज़बूत होंगे."

लेकिन शंकाएं थमती नज़र नहीं आ रहीं. मानो अग़र समझौता हो भी जाता है और अमरीका अपनी ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभाता तो भारत के पास क्या विकल्प होगा.

इस सवाल पर भारतीय विदेश सचिव शिव शंकर मेनन का कहना था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संसंद में स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार रखता है.

जहां तक भारत-अमरीका परमाणु समझौते के भविष्य की बात है तो इसकी उलटी गिनती शुरु हो गई है और आने वाले एक दो दिन में तस्वीर बिलकुल साफ़ होगी कि कौन कितना और किन शर्तों पर समझौता करने को तैयार है.