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शुक्रवार, 01 दिसंबर, 2006 को 13:38 GMT तक के समाचार

आलोक कुमार
बीबीसी संवाददाता

जातीय वर्चस्व जताने का अनोखा तरीक़ा

कृष्णा माँझी इस बात से ख़ासे नाराज़ हैं कि उनके गाँव के मुख्य द्वार का नाम 'राजपूत द्वार' रख दिया गया है.

थुमहा गाँव के एक कोने में मुसहर बस्ती में रहने वाले माँझी का कहना है कि उनके गाँव में आठ जातियों के लोग रहते हैं, इसलिए किसी एक जाति के नाम पर गाँव की पहचान बनाने की कोशिश ठीक नहीं है.

दूसरी ओर राजपूत जाति के ललन सिंह कहते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं है.

उनके चाचा और पंचायत के सरपंच राजकुमार सिंह का कहना है, "राजपूतों ने इस गाँव के लिए काफ़ी कुछ किया है. हमारी जाति की संख्या भी सबसे अधिक है. इसलिए हमने गाँव के मुख्य द्वार का नाम अपनी जाति के नाम पर रखा है."

यह तो एक बानगी है. आपको बिहार के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई गाँव मिल जाएँगे जिनका मुख्य द्वार किसी ख़ास जाति के नाम पर है. जैसे, निषाद द्वार, सिंह द्वार, राजवंशी द्वार, चौहान द्वार, भूमिहार द्वार.

कुछ गाँव ऐसे भी हैं जहाँ जाति सूचक द्वार बनाने को लेकर जातीय संघर्ष भी हुआ है.

जातीय वर्चस्व की लड़ाई

बिहार की राजधानी पटना से मुज़फ्फ़रपुर के बीच 85 किलोमीटर लंबे रास्ते और हाजीपुर-महुआ पथ के किनारे ऐसे कई गाँवों में जाकर जब मैने लोगों से बातचीत की तो पता लगा कि जाति सूचक द्वार भी बिहार की जाति आधारित राजनीति का हिस्सा हैं.

हाजीपुर के निकट दीघी गाँव का प्रवेश द्वार कुछ साल पहले ही बना है और इसका नाम 'यादव द्वार' रखा गया है.

गाँव में चाय की दुकान चलाने वाले यादव समुदाय के ही नरहरि नाथ राय कहते हैं, "हमारे गाँव में यादवों की बैठक हुई थी जिसमें द्वार बनाने का फ़ैसला किया गया. जब राजपूत और भूमिहार द्वार बन सकते हैं तो यादव द्वार क्यों नहीं बन सकता."

हाजीपुर-महुआ पथ पर है 'निषाद द्वार' जो बदनपुर मिलकी गाँव जाने का रास्ता है.

इस गाँव में रहने वाले अनुसूचित जाति के जयराम पासवान कहते हैं, "इस गाँव में मल्लाह भी रहते हैं लेकिन उनके अलावा अन्य जातियों के लोग भी तो हैं. यह द्वार मुखिया ने सरकारी फंड से बनवाया और उस समय झगड़ा झंझट भी हुआ. इसे तो किसी दिन टूटना ही है."

इसी गाँव के बलजीत कुमार कहते हैं, "जितने पैसे में गेट (द्वार) बनता है, उससे गाँव में स्कूल या अस्पताल भी तो खोला जा सकता है. फिर गाँव का प्रवेश द्वार बनाने की ज़रूरत क्या है."

जाति की राजनीति

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉ अजय कुमार का कहना है कि ये परंपरा पिछले 15 सालों में शुरू हुई है जब लालू प्रसाद यादव ने अलग अलग जातियों के नाम पर सम्मेलन कराना शुरू किया.

वो कहते हैं, लालू यादव, रामविलास पासवान और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछड़ी जातियों को समाज और राजनीति की मुख्य धारा में लाने का तो काम किया लेकिन कहीं न कहीं इन जातियों में उग्रता आ गई.

अजय कुमार का कहना है, "पिछड़ी और अनुसूचित जातियों को लगता है कि जाति सूचक द्वार कहीं न कहीं सवर्ण जमींदारों के ख़िलाफ़ उनकी लड़ाई का भी सूचक है. वहीं सवर्णों को लगता है कि ऐसे द्वार बनाने से उन्हें अपना दबदबा बरकरार रखने में मदद मिलेगी."

हाल ही में वैश्य सम्मेलन का आयोजन करने वाले विधायक विजेंद्र चौधरी कहते हैं, "हम जातियों में जागरूकता लाना चाहते हैं. हमारा मक़सद एक समुदाय को दूसरे से लड़ाना नहीं है. रामविलास पासवान और लालू यादव ने भी तो ख़ास जातियों की गोलबंदी की है और उन्हें राजनीतिक पहचान दी है. फिर हम पीछे क्यों रहें."

हालाँकि वो इस बात को स्वीकार करते हैं कि कई गाँवों में जाति सूचक द्वार बनाने से जातीय तनाव बढ़ा है.

प्रोफ़ेसर अजय कुमार का कहते हैं, "कुछ गाँवों में तो द्वार बन गए हैं लेकिन उस पर किस जाति का नाम हो, इसे लेकर विवाद है. इस तरह के विवाद ख़त्म करने के लिए पढ़े-लिखे लोगों को आगे आना चाहिए."