गुरुवार, 30 नवंबर, 2006 को 17:41 GMT तक के समाचार
सुवोजीत बागची
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
मुसलमानों के शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए भारत सरकार देश भर में उर्दू माध्यम के 125 आवासीय स्कूल की योजना की शुरुआत करने जा रही है.
इस योजना पर लगभग दो हज़ार करोड़ रुपए से अधिक की लागत आएगी. इन स्कूलों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएससी) का पाठ्यक्रम लागू होगा.
इन स्कूलों में अंग्रेज़ी आवश्यक विषय होगा और धर्म पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होगा. इन स्कूलों के अप्रैल, 2007 से शुरू होने की संभावना है.
मानव संसाधन राज्यमंत्री मोहम्मद अली अशरफ़ फ़ातमी ने बीबीसी को बताया कि मुस्लिम सांसदों के इस प्रस्ताव को सरकार ने स्वीकृत करने का फ़ैसला किया है.
फ़ातमी ने बताया,'' मैंने प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह से बात कर ली है और दोनों ने इस परियोजना को स्वीकृति प्रदान कर दी है.''
कुछ महीने पहले 39 मुस्लिम सांसदों ने इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने पेश किया था.
फ़ातमी का कहना था,'' इस प्रस्ताव को आधिकारिक रूप से उस समय स्वीकृति मिलेगी जब यह योजना आयोग के सामने पेश होगा.''
शिक्षा में कमी
ग़ौरतलब है कि भारत में मुसलमानों का शिक्षा की दर 59 फ़ीसदी है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 65 फ़ीसदी है.
इस 144 पेज के प्रस्ताव में देश के 604 ज़िलों में से 125 में अगले साल शुरू हो रही 11वीं पंचवर्षीय योजना में उर्दू माध्यम के स्कूल खोलने का सुझाव है. इन 125 स्कूलों में 42 लड़कियों के लिए रखे जाने की योजना है.
प्रस्ताव के अनुसार लगभग साढ़े चार लाख की उर्दू बोलनेवाली आबादी में एक स्कूल खोला जाए.
इन स्कूलों मे पढ़ाई और प्रवेश के लिए कोई फीस नहीं होगी. साथ ही किताबें और स्कूल की यूनीफार्म भी मुफ़्त उपलब्ध कराई जाएगी.
सांसदों के इस ग्रुप के नेता असदुद्दीन ओवैसी का कहना था कि भारत में मुसलमानों की शिक्षा के आधुनिकीकरण की काफ़ी समय से ज़रूरत महसूस की जा रही थी.
उनका कहना था कि ये स्कूल मदरसे जैसे नहीं होंगे और इनमें विज्ञान और अंग्रेज़ी की शिक्षा दी जाएगी.
ओवैसी का कहना था कि अन्य धर्म के छात्रों को भी इन स्कूलों में प्रवेश के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.