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बुधवार, 29 नवंबर, 2006 को 14:35 GMT तक के समाचार

रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

मनमोहन सिंह से मिले महिंदा राजपक्षे

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने आज पाँच दिन की अपनी भारत यात्रा के अंतिम दिन भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से व्यापक मुद्दों पर बातचीत हुई.

इसमें द्विपक्षीय रिश्तों के अलावा श्रीलंका में जारी संघर्ष की भी चर्चा हुई. महिंदा राजपक्षे की मनमोहन सिंह से सितंबर के बाद यह दूसरी मुलाक़ात थी. इससे पहले वे हवाना में मिले थे.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नवतेज सरना ने इस बाबत बताया, "आज जब दोनों नेता मिले तो व्यापक और विस्तृत बातचीत हुई. भारत ने श्रीलंका से अनुरोध किया कि जातीय समस्या का सभी पक्षों को मान्य कोई हल ढूंढा जाए."

एक घंटे चली इस बैठक में आर्थिक, वाणिज्यिक मामलों और भारत की ओर से श्रीलंका में शुरू की जा रही परियोजनाओं पर भी चर्चा हुई.

यह वार्ता इसिलए भी महत्वपूर्ण हो गई क्योंकि दो दिन पहले ही तमिल छापामार नेता प्रभाकरण ने अपने सालाना भाषण में कहा था कि सिंहल बहुल सरकारें तमिल लोगों को राजनीतिक हक देना नहीं चाहती और ऐसे में एक अलग तमिल ईलम की स्थापना ही एक मात्र हल नज़र आता है.

उन्होंने यह भी कहा था कि वर्ष 2002 में हुआ युद्धविराम का समझौता अब बेमानी हो गया है.

भारत की चिंता

श्रीलंका में हाल में बढ़ी हिंसा से भारत चिंतित है. देश में न केवल श्रीलंका से आ रहे तमिल शरणार्थियों की संख्या ही बढ़ रही है बल्कि तमिलनाडु में श्रीलंका के तमिलों के साथ हो रहे व्यवहार पर राजनीति भी शुरू हो गई है.

राजपक्षे की भारत यात्रा के दौरान राज्य में कई जगह धरने-प्रदर्शन भी हुए. राज्य की डीएमके सरकार केंद्र की सत्ता में भागीदार है और उसका केंद्र सरकार पर ख़ासा दबाव है.

माना जाता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तमिल विद्रोहियों के प्रभाव वाले इलाकों में मानवीय त्रासदी, वहाँ के उत्तर और पूर्वी प्रांतों के एक बने रहने जैसे मामले भी उठाए.

महिंदा राजपक्षे 2005 में सत्ता में आए थे और उन्होंने जातीय समस्या का हल ढूंढ़ने के लिए एक सर्वदलीय समिति भी बनाई थी. इसकी जानकारी भी उन्होंने प्रधानमंत्री को दी.

इस बारे में नवतेज सरना ने कहा, "श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उनकी ओर से स्थापित सर्वदलीय प्रतिनिधि समिति के बारे में बाताया. यह समिति सत्ता के विकेंद्रीकरण तैयार कर रही है जिससे इस जातीय समस्या का राजनीतिक हल निकल पाए."

श्रीलंका की गंभीर होती स्थिति भारत सरकार के लिए चिंता का विषय है क्योंकि वहाँ का सीधा असर देश में भावनात्मक और राजनीतिक स्तर पर दिखाई देता है.