सोमवार, 27 नवंबर, 2006 को 16:04 GMT तक के समाचार
आपकी दुनिया आपकी आवाज़ कारवाँ के कार्यक्रम तय करने से पहले बीबीसी ने यह जानने के लिए कि लोग किन मुद्दों पर बात करना चाहेंगे, नई दिल्ली स्थित संस्था ‘प्रस्तुत’ से एक सर्वेक्षण करवाया.
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के 14 ज़िलों में इन कार्यक्रमों में श्रोताओं की भागीदारी इसी सर्वेक्षण के नतीजों पर आधारित है.
हर ज़िले में लोगों का मानना था कि बीबीसी परिवर्तन लाने में सक्षम है. बीबीसी के कार्यक्रमों के लिए गहरा सम्मान व्यक्त करते हुए, उन्होंने हिन्दी संवाददाताओं की सराहना की और कहा कि वे सत्ता में बैठे बड़े से बड़े अधिकारियों से सीधे सवाल कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश में शोधकर्ता तीन ज़िलों – भदोही, ओबरा तथा रेणूकूट गए. वहाँ उन्होंने किसानों, व्यापारियों, पुलिस कर्मियों, मीडिया कर्मियों तथा शिक्षा-विदों से मिलकर उनके सरोकारों पर बात-चीत की. इन शहरों में जो बातें मुख्य रूप से उभर कर आईं, वे हैं :
भदोही
इस शहर के लोगों का कहना है कि कालीन उद्योग के ह्रास का गहरा असर समाज पर पड़ा है.
परंपरा से बाल-श्रम पर आधारित और दूर-दूर फैले गाँवों में छोटे स्तर पर चलने वाला है यह उद्योग, इस कारण यहाँ पहुँचना बहुत कठिन है. अत: दिल्ली और आगरा जैसे शहरों से यह पिछड़ जाता है.
उद्योग की बिगड़ती हालत के चलते अपराध में आए दिन वृद्धि हो रही है और लोग सड़क पर चलने से भी डरते हैं. उनका पुलिस पर से भरोसा उठ रहा है.
बहुत सारे लोगों का मानना है कि बिजली की कमी के कारण शहर का विकास रुक रहा है और अपराध बढ़ रहा है.
वे कहते हैं कि गंदे पानी के निकास की ख़राब व्यवस्था के कारण मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलती हैं. सड़कों की हालत यह है कि बीमार, अस्पताल पहुँचने से पहले, रास्ते में ही दम तोड़ देता है.
ओबरा
शिक्षा का नितांत अभाव है. उच्च शिक्षा तो है ही नहीं, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी गिने-चुने ही हैं. शिक्षा और सोचने-समझने के सामर्थ्य की कमी बेरोज़गारी के कारण बनते हैं.
बेरोज़गारी से उपजती है ग़रीबी, जिसका सीधा प्रभाव होता है युवा पीढ़ी पर. इसके कारण उनमें हताशा उपजती है और वे या तो कोई छोटे-मोटे काम करने लगते हैं, या फिर निठल्ले पड़े-पड़े मायूस हो जाते हैं.
माना जाता हैं कि बेरोज़गारी से अपराध बढ़ते हैं. स्थानीय उद्योग काफ़ी प्रदूषण फैलाते हैं, जिससे साँस जैसी कई दूसरी बीमारियाँ होने लगती हैं. पेय-जल एक दूसरी बड़ी समस्या है.
सड़कों ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है. उनकी आम शिकायत है कि पर्याप्त सड़कें नहीं हैं.
जो हैं, उनकी हालत इतनी ख़स्ता है कि उनमें जगह-जगह बने गड्ढों में पानी भर जाता है और सड़ने के बाद गंधाने लगता है, जिससे बीमारियाँ फैलती हैं.
रेणूकूट
यहाँ सबसे बड़ी समस्या है - आवास. घने जंगलों से घिरे होने के कारण लोगों ने अपने घर सड़क किनारे बना लिए हैं.
अब आशंका जताई जा रही है कि बड़ी संख्या में लोग बेघर हो जाएँगे, क्योंकि मुख्य मार्ग को चौड़ा करने की एक बहुत बड़ी योजना के चलते इन लोगों को यहाँ से हटा दिया जाएगा, जबकि इनके पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की गई है.
शिक्षा भी यहाँ चिंता का एक बड़ा मुद्दा है. लोगों की शिकायत है कि जिन लोगों को पढ़ाने के लिए पैसे दिए जाते हैं, वे विद्यार्थियों को पढ़ाने की बजाए या तो उनसे अपने खेतों में बेगार करवाते हैं, या अपने निजी कामों में उलझाए रखते हैं.
प्रदूषण भी एक बड़ा मुद्दा है – इस इलाके में एक अल्यूमीनियम कारख़ाना है. लोगों की शिकायत है कि वातावरण में इतना अधिक प्रदूषण है कि वे ठीक से साँस भी नहीं ले पाते हैं और कारख़ाने से छोड़े जाने वाले रसायन पेय-जल को प्रदूषित करते रहते हैं.
इन सभी मुद्दों पर तो बीबीसी हिन्दी कार्यक्रमों में चर्चा होगी ही, अपकी दुनिया आपकी आवाज़ कारवाँ के दौरान उत्तर प्रदेश में निम्नलिखित विषयों पर भी चर्चा होगी :
भदोही 16/11 कालीन उद्योग
ओबरा 19/11 फैलता नक्सलवाद
रेणूकूट 21/11 बड़े उद्योग और प्रदूषण