आमेर अहमद खान
पाकिस्तान संपादक, इस्लामाबाद
परेशानियों से घिरे पाकिस्तानी नेतृत्व के लिए चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की यात्रा के लिए इससे अच्छा समय नहीं हो सकता था.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने इस साल का ज़्यादातर हिस्सा असंतुष्ट पड़ोसियों, संसद में मौजूद अड़ियल इस्लामी नेताओं और सीमावर्ती क्षेत्रों में दिनों-दिन मज़बूत होते जा रहे धार्मिक कट्टरपंथियों का सामना करने में बिताया है.
ऐसे में राष्ट्रपति मुशर्रफ़ बेसब्री से किसी ऐसे मित्र से हाथ मिलाने का इंतज़ार कर रहे थे भले ही बदले में उन्हें उससे कोई राजनीतिक लाभ ना हो.
पाकिस्तान को ऐसा नि:स्वार्थ समर्थन देने के लिए चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ से बेहतर कोई और नेता नहीं हो सकता.
ऐसी स्थिति में इस बात पर शायद ही किसी को आश्चर्य होगा कि चीन की आधिकारिक समाचार एजेंसियाँ इस दौरे को एक ऐसा सौदा करार दे रही हैं जिनकी 'इतिहास में कोई बराबरी नहीं है.'
पिछले 40 साल से चीन और पाकिस्तान ने क्षेत्र के अशांत राजनीतिक हालात में भी अपनी दोस्ती को लगातार बचाए रखा है.
केवल यही नहीं बल्कि दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से लेकर हथियार निर्माण और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्रों में भागीदारों की तरह काम किया है.
चीन के भारत के साथ ठीक उसी तरह के विवाद रहे हैं जैसे पाकिस्तान और भारत के बीच हैं.
चीन का अरुणाचल प्रदेश पर दावा और पाकिस्तान की कश्मीर को लेकर भारत से लड़ाई ने पारंपरिक रुप से इन दोनों देशों के बीच एक समान भावना को बनाए रखा है.
नई सच्चाईयाँ
लंबे समय से ये समान भावना की वजह से दोनों देशों के बीच बना दोस्ती का रिश्ता नए सौदों को सुनिश्चित करता आया है.
लेकिन पाकिस्तानी सरकार के रक्षा विशेषज्ञ इस मामले पर अपनी अलग राय रखते हैं.
पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दिक़ी आगा का कहना है, "चीनी राष्ट्रपति की ऐतिहासिक भारतीय यात्रा के बाद हमें दक्षिण एशिया में नए सुरक्षा परिदृश्य देखने को मिल सकते हैं. यही नहीं भारत, चीन और अमरीका के एक उभरते त्रिगुट पर भी हमारी नज़र जा सकती है."
ऐसा माना जा रहा है कि चीन को भारत अमरीका परमाणु समझौते से कोई आपत्ति नहीं है. उन्होंने कहा कि इस नए परिदृश्य से पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों की नीदें ज़रूर उड़ गईं होंगी.
आयशा का ये भी तर्क है कि चीन और पाकिस्तान कभी भी किसी बहुपक्षीय समझौते में शामिल नहीं रहे हैं जबकि जिंताओ की भारत यात्रा से ऐसी संभावना बढ़ी है.
लेकिन एक अन्य रक्षा विशेषज्ञ डॉ. हसन अस्करी रिज़वी कहते हैं कि पाकिस्तान और चीन के संबंध हमेशा से भारत और चीन के संबंधों से बेहतर रहे हैं.
शांति दूत
हसन अस्करी रिज़वी कहते हैं कि भारत और चीन ने प्रगाढ़ संबंध स्थापित करने की घोषणा तो की है लेकिन कुछ मुद्दे हैं जो उनके रास्ते में मुश्किलें पैदा करते हैं.
इन मुद्दों में सीमा विवाद, तिब्बत समस्या, भारतीय उद्योगों पर चीन के छोटे उद्योगों के विकास से पड़ रही मार शामिल हैं.
रिज़वी के मुताबिक़ चीन को इस बात का एहसास है कि अगर उसे क्षेत्र में एक प्रमुख भूमिका अदा करनी है तो पहले उसे अपने आप को शांति दूत के रूप में स्थापित करना होगा.
यही पाकिस्तान के लिए सबसे कठिन होगा क्योंकि चीन अब उन संघर्षों में मूक दर्शक बने रहने के लिए तैयार नहीं, जिनमें पाकिस्तान का हस्तक्षेप है या पाकिस्तान शामिल है.
इसके अलावा ये भी संभावना जताई जा रही है कि शायद चीन अब पाकिस्तान को अपने परेशान पड़ोसी देशों के साथ लगातार अघोषित लड़ाई जारी रखने की उसकी नीति के लिए कोई नैतिक, राजनैतिक या कोई अन्य मदद नहीं दे.
ऐसा माना जा रहा है कि यही कारण है कि दोनों देशों के बीच बहुप्रतीक्षित नागरिक परमाणु सहायता समझौते पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है.