सोमवार, 20 नवंबर, 2006 को 17:23 GMT तक के समाचार
चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ भारत की यात्रा पर राजधानी नई दिल्ली पहुँच गए हैं. यात्रा का मक़सद भारत के साथ आर्थिक संबंध और मज़बूत करना है.
पिछले 10 सालों में पहली बार चीन के राष्ट्रपति का यह भारत दौरा है. राष्ट्रति जिंताओ मंगलवार को बैठकों का दौर शुरू करेंगे.
मंगलवर को ही राष्ट्रपति भवन में उनका समारोहपूर्वक स्वागत किया जाएगा. वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और अन्य नेताओं से मुलाक़ात करेंगे.
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अलावा राष्ट्रपति जिंताओ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गाँधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और लोकसभा के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी से भी मिलेंगे.
उधर तिब्बत के कुछ संगठन हू जिंताओ की भारत यात्रा का विरोध कर रहे हैं. सोमवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी किया.
रणनीतिक साझेदार
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी का कहना है कि दोनों देश दशकों पुराने अपने मतभेद को पीछे छोड़कर रणनीतिक साझेदारी स्थापित करना चाहते हैं.
अपने भारत दौरे के क्रम में राष्ट्रपति जिंताओ व्यापार और अन्य समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे. कुछ लोगों को सीमा विवाद पर भी समझौते की उम्मीद है.
लेकिन ध्यान आर्थिक संबंधों पर ज़्यादा है. दस साल पहले दोनों देशों के बीच प्रति वर्ष कुछ लाख डॉलर का ही व्यापार होता था.
लेकिन आज स्थिति अलग है. दोनों देशों के बीच प्रति वर्ष क़रीब 20 अरब डॉलर का व्यापार होता है. चीन में कम क़ीमत में तैयार सामान भारतीय बाज़ारों में ख़ूब बिकते हैं.
इनमें खिलौने से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान तो है हीं, साथ ही पटाखे और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तक चीन से बनकर भारतीय बाज़ारों में आ रही हैं.
चीन की कई बड़ी कंपनियों ने भारत में भारी निवेश किया है. इन कंपनियों ने बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र जैसे सड़कों और दूरसंचार में ज़्यादा रुचि दिखाई है.
ऐसा नहीं है कि व्यापार एकतरफ़ा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेवा क्षेत्र में भारत की तूती बोलती है. भारत की कई शीर्ष सूचना तकनीक कंपनियों ने चीन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है.
क्षेत्रीय स्तर पर भले ही इन दोनों देशों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी माना जाता है लेकिन कई जानकारों का कहना है कि दोनों देश अपनी शक्ति-सामर्थ्य से दुनिया में अपनी पैठ बना सकते हैं.
भारत के चर्चित उद्योगपति केके मोदी का कहना है कि अब यह मामला प्रतिद्वंद्विता का नहीं बल्कि समझौते का है.
उन्होंने कहा, "प्रतियोगिता कंपनियों और व्यापार में है और यह जारी रहेगा. यह प्रतियोगिता देशों के बीच में नहीं है. दरअसल ये कहना ग़लत होगा कि देश प्रतिद्वंद्विता में उलझे हैं. यह व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता है."
मोदी जैसे भारतीय उद्योगपतियों को उम्मीद है कि दोनों देशों के नेताओं आर्थिक समझदारी दिखाएँगे और अपने राजनीतिक मतभेद भी ख़त्म करेंगे.
विवादित मुद्दे और समझौता
हू जिंताओ की यात्रा से मात्र एक हफ़्ते पहले दोनो देशों के बीच अरूणाचल प्रदेश के मुद्दे पर विवाद छिड़ गया था.
भारत में चीन के राजदूत सुन यूशी ने दावा किया था -'जहाँ तक चीन के रुख का सवाल है केवल टावाँग का इलाक़ा ही नहीं, पूरा अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है - और उस पर हमारा हक़ है.'
उधर भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पत्रकारों से सवालों के जवाब में कहा था कि 'अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है.'
भारत और चीन के रिश्तों में 1962 के युद्ध के बाद भिन्न-भिन्न समय पर तनाव बढ़ता रहा है.
दोनो देशों के रिश्ते तब सुधरने शुरु हुए थे जब जून 2003 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन की यात्रा की थी.
उस दौरान भारत और चीन ने एक अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें व्यापार और आपसी रिश्ते बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया था.
पर्यवेक्षकों के अनुसार इसी समझौते के अनुसार भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना गया था और दूसरी ओर चीन ने परोक्ष रूप से सिक्किम को भारत का अंग मान लिया था.
व्यापारिक समझौते के तहत भारत और चीन सीमा पर एक और व्यापारिक केन्द्र खोलने पर राज़ी हुए. उस समय तय हुआ कि तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र में ये केंद्र रिकिनगांग में होगा और सिक्किम के चांगू में होगा.
इसके बाद अप्रैल 2005 में भारत-चीन वार्ता तब आगे बढ़ी जब चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत यात्रा पर आए.
इसके बाद जुलाई 2006 में लगभग 44 साल के बाद नाथू ला दर्रा व्यापार के लिए खोल दिया गया. नाथू ला दर्रा भारत के सिक्किम और चीन के तिब्बत प्रांत को जोड़ता है.