सोमवार, 20 नवंबर, 2006 को 20:11 GMT तक के समाचार
चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ भारत की यात्रा पर राजधानी नई दिल्ली पहुँच चुके हैं लेकिन उनकी यात्रा से क्या उम्मीदें लगाई जा सकती हैं?
पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर का मानना है कि इस यात्रा की सफलता को इस तरीके से नहीं आंकना चाहिए कि कितने समझौतों पर हस्ताक्षर हुए.
उन्होंने बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल को बताया कि इस यात्रा की असली सफलता यही है कि चीन के नंबर एक नेता और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भारत की यात्रा पर आए हैं.
'समस्याओं का हल नहीं'
उनका कहना है कि इन दौरों का मकसद यही बताना होता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते अच्छे हैं और अब इन्हें और आगे कैसे बढ़ाया जाए.
पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर का मानना है कि इस यात्रा से समस्याओं के हल इत्यादि जैसे कोई उम्मीदें लगाना ठीक नहीं होगा.
उनका कहना है कि पिछले अनुभव यही बताते हैं कि ऐसी हस्तियों का दौरा समस्याओं के हल के लिए नहीं बल्कि द्विपक्षीय रिश्तों की स्थिति दिखाने के लिए होता है.
उनका कहना था कि भारत में चीन के राजदूत की अरुणाचल के बारे में टिप्पणी आम बात है जिसका मकसद यही दिखाना है रिश्ते तो अच्छे हैं लेकिन ये एक ऐसा मुद्दा है जो हल नहीं हुआ है.
सलमान हैदर का कहना है कि इस विषय में दोनो पक्षों के बीच काफ़ी समय से बातचीत हो रही है और जब तक मुद्दा हल नहीं हो जाता, दोनो पक्ष इस बारे में अपना-अपना रुख़ स्पष्ट करते रहेंगे.
वे कहते हैं कि ये मानकर चलना चाहिए कि हू जिंताओ दोनो देशों के दोस्ताना रिश्तों को आगे बढ़ाने के मकसद से आ रहे हैं.
'व्यापार पर विशेष ध्यान'
उधर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नहरु विश्वविद्यालय में चीन मामलों की विशेषज्ञ अलका आचार्य मानती है कि दोनो देशों के बीच का सीमा विवाद चर्चा में ज़रुर आएगा लेकिन उस पर मोटे तौर पर ही चर्चा होगी.
अलका आचार्य ने बीबीसी के मोहनलाल शर्मा को बताया कि पाकिस्तान को चीन से मिलने वाली सैन्य मदद, विशेष तौर पर परमाणु क्षेत्र में, चर्चा का एक और महत्वपूर्ण विषय होगी.
लेकिन अलका आचार्य ज़ोर देकर कहती है कि व्यापार और आर्थिक रिश्तों में हाल में आई गति पर विशेष नज़र रहेगी.
उनके अनुसार अनुमान ये है कि दोनो देशों के बीच तीन साल के व्यापार के बारे में जो अनुमान हैं, उन्हें और विस्तृत बनाना और दीर्घकालिक रिश्तों में पूँजी निवेश और औद्योगिक क्षेत्र की साझेदारी पर ज़्यादा ध्यान रहेगा.