रविवार, 12 नवंबर, 2006 को 08:30 GMT तक के समाचार
मोनिका चड्ढा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई के एक अस्पताल में साफ़-सफ़ाई का काम करने वाले गिरीश राठौड़ की ज़िंदगी इन दिनों बदल गई है.
दरअसल, पिछले दिनों गिरीश की दो करोड़ रुपए की लॉटरी लगी है और अब उन्हें इस बात की ख़ुशी हैं कि घर-गृहस्थी की तमाम ज़रूरतों को दबाना नहीं पड़ेगा.
42 वर्षीय गिरीश कहतें हैं कि इन पैसों से वो अपनी पत्नी और बच्चों के लिए एक मकान ख़रीदने चाहते हैं और इससे बचे पैसे को बैंक में जमा कराना चाहते हैं.
गिरीश नगर निगम के अस्पताल की नौकरी को भी नहीं छोड़ना चाहते हैं क्योंकि यह उनके लिए नियमित आय का एकमात्र साधन है.
गिरीश पिछले साढ़े तीन साल से लॉटरी के टिकट ख़रीद रहे थे.
वो बताते हैं, ‘‘मैं हर सप्ताह 10 रुपए लॉटरी के टिकट पर ख़र्च करता था. इसके लिए मेरी पत्नी डाँटा भी करती थी कि मेहनत से कमाए पैसे को फ़िज़ूल में ख़र्च न किया करो. इसलिए मैं उससे छिपा कर लॉटरी के टिकट ख़रीदा करता था.’’
गिरीश ने बताया कि इनामी टिकट को उसने इस महीने के शुरू में ख़रीदा था. एक दिन बाद उसने जब नंबर मिलाए तो पहले इनाम के लिए घोषित सारे नंबर वही थे, जो उसके टिकट पर थे.
वे कहते हैं, ‘‘मुझे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ और मैंने अपनी पत्नी से कहा कि लगता है मैं करोड़पति बन गया हूँ. तुम ज़रा नंबर मिला कर बताओ. जब उसने भी पुष्टि की तब जाकर मुझे यकीन हुआ.’’
पुराने दिन
गिरीश इतना पैसा पाने के बाद भी अपने पुराने दिनों को भूलना नहीं चाहते हैं.
वे कहते हैं, ‘‘मैं कड़ी मेहनत करता था इसके बाद भी अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाता था.’’
गिरीश को नौकरी से 10 हज़ार रुपए वेतन मिलता है लेकिन कर्ज़ की किस्त और मकान का किराया देने के बाद केवल 1500 रुपए बचते हैं.
उनके परिवार में पाँच सदस्य हैं और सभी 100 वर्ग फीट के एक छोटे-से कमरे में रहते हैं.
ज़ाहिर है मकान ख़रीदना उनकी पहली प्राथमिकता है.
गिरीश कहते हैं, ‘‘मैं जब भी अपनी पत्नी के साथ बाहर जाता था तो हम दोनों ऊँची-ऊँची इमारतों की ओर हसरत भी निगाह से देखते थे और बातें करते थे कि क्या कभी अपना घर होगा. अब यह सपना पूरा हो जाएगा.’’
मकान ख़रीदने के बाद गिरीश पैसों का कुछ हिस्सा अपने तीनों बच्चों की शिक्षा के लिए बचा कर रखना चाहते हैं. इसके अलावा वो अपने परिजनों की भी मदद करना चाहते हैं.
माँ का जिक़्र आते ही गिरीश की आँखें छलक जाती हैं. वे कहते हैं कि आख़िरकार वो भी अच्छे दिन देखेंगी.
गिरीश बताते हैं, ‘‘मेरे माता-पिता नगर निगम में काम करते थे. माँ 80 वर्ष की उम्र में भी मेरी मदद करने के लिए निजी इमारतों में सफ़ाई का काम करती रहीं. अब उसे काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.’’
गिरीश अपनी नौकरी आगे भी जारी रखना चाहते हैं.
वे बताते हैं, ‘‘मेरे दोस्ते कहते हैं तुम अब करोड़पति हो गए हो, नौकरी करने की क्या ज़रूरत हैं लेकिन मैं उन्हें कहता हूँ कि इससे मेरे परिवार का गुज़ारा होता था मैं यह काम कभी नहीं छोड़ूंगा.’’
वैसे गिरीश का यह फ़ैसला सही भी है क्योंकि पैसे हाथ में आते-आते तीन महीने लग जाएंगे. इसके अलावा पूरे दो करोड़ मिलेंगे भी नहीं.
इसका 10 प्रतिशत हिस्सा सिक्किम सरकार को चला जाएगा और 35 प्रतिशत आयकर भी देना पड़ेगा.
गिरीश को फिलहाल इन बातों की चिंता नहीं हैं. वो तो ख़ुश हैं कि उसका बेटा बहुत दिनों से साइकिल की माँग कर रहा था जिसे वो अब पूर कर सकेंगे.