मंगलवार, 31 अक्तूबर, 2006 को 13:39 GMT तक के समाचार
सुशील झा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने सीलिंग के मामले पर जिस निगरानी समिति का गठन किया है उसने प्रशासन को दो नवंबर से सीलिंग दोबारा शुरू करने के निर्देश दिए हैं.
निगरानी समिति ने दिल्ली नगर निगम से कहा है कि दो नवंबर से रिहाइशी इलाक़ों में चलने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील करने का काम दोबारा शुरू कर दिया जाए.
इसी निगरानी समिति ने सोमवार को व्यापारियों की तीन दिन की हड़ताल को देखते हुए सीलिंग न करने के निर्देश दिए थे.
दूसरी ओर, केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा है कि दिल्ली में सीलिंग के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं और सरकार व्यापारियों के हितों के लिए एक बार फिर कोर्ट में जाएगी.
रिहाइशी कॉलोनियों में सीलिंग का विरोध कर रहे व्यापारियों ने आज दूसरे दिन भी अपनी दुकानें बंद रखीं और कुछ स्थानों पर दिल्ली नगर निगम और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुतले भी जलाए गए.
शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा, "हमने दिल्ली नगर निगम के ज़रिए अपनी राय से सुप्रीम कोर्ट को अवगत करा दिया है."
यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार कोर्ट में जाएगी तो उनका कहना था, "हमने शनिवार को मंत्रियों के समूह में भी फ़ैसला किया था कि कोर्ट जाएँगे. याचिका दायर करेंगे और कोर्ट से अपील करेंगे की सात और 15 सितंबर की अधिसूचनाओं के तहत व्यापारियों को राहत दी जाए."
दिल्ली की रिहाइशी कालोनियों में चल रही दुकानों का मामला पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच खींचतान का कारण बना हुआ है.
कोर्ट के आदेश पर कुछ दुकानों की सीलिंग की गई जिसके बाद सरकार ने सात सितंबर और 15 सितंबर को अधिसूचनाएं जारी कर कई इलाक़ों को रिहाइशी के साथ-साथ व्यवसायिक करार दे दिया.
इससे कई दुकानें सील होने से बचीं लेकिन कोर्ट ने सरकार को आड़े हाथों लिया.
विरोध
करोल बाग़ में अपनी दुकान चलाने वाले नारायण सारा दोष सरकार पर मढ़ते हैं. वे कहते हैं, "सब सरकार की ग़लती है. वो कुछ नहीं करती है. पिछले बीस साल से सो रही थी. अब जागी है. सरकार हमसे टैक्स लेती है तब क्या हम अवैध नहीं थे."
चालीस हज़ार व्यापारियों में कुछ छोटे दुकानदार हैं जिन्हें कोर्ट के एक अन्य आदेश के तहत राहत मिली है लेकिन बड़े दुकानदारों का तर्क है कि यह भेदभाव क्यों.
ग्रेटर कैलाश के एक बड़े व्यापारी शिवकरण कहते हैं, "बड़े व्यापारियों के साथ भेदभाव क्यों. हमने भी बैंक से कर्ज़ लिया है. किराए पर दुकान चला रहे हैं. अगर हमारे बाप-दादा ने चालीस साल पहले दुकान शुरु की और वो बड़ी हो गई तो इसमें हमारा दोष क्यों."
असल में कोर्ट ने इन बड़े व्यापारियों को ए और बी कैटेगरी में रखा है जिन्हें कोई राहत नहीं दी गई है. ऐसे व्यापारियों की संख्या तकरीबन पाँच हज़ार है.
जानकार कहते हैं कि दोष दिल्ली की पूर्व सरकारों और नगर निगम के अधिकारियों का सबसे अधिक है जिनके भ्रष्टाचार के कारण ये दुकानें फली फूली लेकिन अब रास्ता क्या है.
जयपाल रेड्डी कहते हैं कि राष्ट्रीय राजधानी की जनसंख्या डेढ़ करोड़ है और उसकी व्यवसायिक ज़रुरतों को समझा जाना चाहिए.
अब सरकार फिर कोर्ट में जा रही है और दिल्ली के व्यापारियों के साथ साथ आम जनता भी उम्मीद कर रही है कि इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकाला जाए.