मंगलवार, 24 अक्तूबर, 2006 को 12:20 GMT तक के समाचार
ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
विदर्भ में किसान अभी भी आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन इस क्षेत्र में आहिस्ता आहिस्ता एक ऐसी क्रांति जड़ पकड़ कर रही है जो शायद इस सिलसिले को ख़त्म कर दे.
ग़ौरतलब है कि राज्य और केंद्र सरकार की ओर से कई योजनाएँ बनने के बावजूद इस इलाक़े में हर दिन, औसतन, तीन किसान कर्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं.
लेकिन विदर्भ में साहूकारों के चंगुल से निकलने की क्रांतिकारी पहल हो रही है और इसकी अगुआई कर रही हैं वहाँ की महिलाएँ.
इन महिलाओं को ताक़त मिली है लघु ऋण की योजनाओं से यानी छोटे ऋण की सुविधाओं से.
पिछले हफ़्ते मैं जब नागपुर से 40 किलोमीटर दूर केसलापुर गया तो वहाँ मैने देखा महिलाएँ एक सभा में अपने विचार प्रकट कर रही हैं.
ये 12 महिलाओं का एक समूह है जो विदर्भ के उन 40 हज़ार गुटों का एक हिस्सा है, जो छोटी राशि के कर्जों की योजनाओं से जुड़े हैं.
स्वयं सहायता समूह
इस क्षेत्र में पिछले दो सालों में मैं कई बार आया हूँ और किसानों की समस्याओं पर रिपोर्टिंग भी की है लेकिन विदर्भ की महिलाओं के बीच आहिस्ता आहिस्ता उठ रही इस क्रांति को मैं देख नहीं सका था. अब इस क्रांति में पांच लाख महिलाएं शामिल हैं.
केसलापुर की शोभा गजबे दलित हैं और इस क्रांति का अटूट हिस्सा. उनके गुट को 25 हज़ार रुपए का कर्ज़ मिला है. वो हर दिन सौ से ज़्यादा बच्चों के लिए खिचड़ी पकाती हैं.
शोभा कहती हैं, “इससे पहले हमें यहाँ के स्थानीय साहूकार पीड़ित करते थे. अब हम गुट बनाकर बैंक में पैसे जमा भी करते हैं और कर्ज़ भी हासिल करते हैं,केवल दो फ़ीसदी ब्याज़ दर पर.”
हर गुट में दस से बारह महिलाएँ होती हैं. वो हर महीने 50 रूपए से लेकर हज़ार रूपए तक बैंक में जमा करती हैं. कमला नायक कुछ साल पहले इस योजना से जुड़ीं थीं, आज उनके खाते में एक लाख रूपए से ज़्यादा जमा हैं.
महिलाएं पैसा जमा करती हैं और बैंक उनके गुट को केवल दो फ़ीसदी ब्याज़ पर कर्ज देते हैं. इस कर्ज़ से महिलाएँ छोटा मोटा व्यापार शुरू करती हैं.
विदर्भ के इस पिछड़े गाँव मथनी में मैने इसका एक बड़ा उदाहरण भी देखा. मेरी निगाह एक दुकान पर पड़ी जो पीसीओ होने के अलावा वीडियो और कैसेट की दुकान भी थी.
इस दुकान को चला रहीं थीं एक गुट की 12 महिलाएँ. उनमें से एक हेमलता दंडे कहती हैं, “इस दुकान को चलाने के लिए बैंक ने हमें एक लाख बीस हज़ार रूपए कर्ज़ दिए,जिसमें से 60 हज़ार हमने वापस भी कर दिए. पहले हम बैंकों के पीछे भागते थे अब बैंक हमारे पास आते हैं’’
ज़िम्मेदार कौन?
इन सारी बातों के बावजूद सवाल ये है कि क्या वजह है कि यहाँ के किसान आत्महत्या पर मजबूर हैं.
माया वानखड़े कई सालों तक पिछड़े ज़िला यवतमाल में इस योजना को चला चुकी हैं. वो कहती हैं, “आत्महत्या की ज़िम्मेदार सरकार की नीति है,किसानों के पास कपास तैयार होने के बाद भी सरकार दो तीन महीने तक खरीदती नहीं है जिससे किसान कर्ज़ वसूल नहीं कर पाता.’’
कुछ महिलाओं का ये भी कहना था कि ये छोटे कर्जे क्षेत्र के अधिकतर किसानों को अब भी मुहैया नहीं होते.
लेकिन छोटी राशि का कर्ज देने वाली संस्थाओं के महासंगठन के एक अधिकारी संजय संगेकर का कहना है कि वो महिलाओं को शक्तिशाली इसलिए बना रहे हैं ताकि उनके परिवार में खुशहाली आए और आत्महत्याएँ रुकें.
वे कहते हैं, “विदर्भ की महिलाओं में आत्मविश्वास आया है,जागरुकता आई है और अपने मर्दों पर निर्भर न रहने की क्षमता भी. ये इस योजना की एक बड़ी सफलता है’’
इन गुटों की महिलाओं के अनुसार अग़र ये छोटे कर्ज़ उन्हें नहीं मिलते तो और भी किसान आत्महत्या करते.