बुधवार, 25 अक्तूबर, 2006 को 00:04 GMT तक के समाचार
सुझील झा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कांगेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी को विदेश मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में सबसे प्रभावशाली मंत्रियों में से एक रहे हैं प्रणव मुखर्जी.
भले ही उनके पास एक ही मंत्रालय हो लेकिन प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में सरकार चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी इस 71 वर्षीय बंगाली ब्राह्णण के सिर पर आ जाती है.
पाँच बार राज्य सभा में पहुँचने वाले प्रणव मुखर्जी पिछले लोकसभा चुनावों में पहली बार जनता के बीच गए जीत दर्ज कराई.
वर्तमान सरकार में काफ़ी समय से रक्षा मंत्री के तौर पर काम करने वाले मुखर्जी के ज़िम्मे सिर्फ़ यही मंत्रालय नहीं बल्कि कम से कम 30 'ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स' की ज़िम्मेदारी भी है जो संभवत: विदेश मंत्री बनने के बाद न रहे.
ऐसा नहीं है कि मुखर्ज़ी पहली बार विदेश मंत्री बने हों. वो इससे पहले 1995-96 में भी कांग्रेस सरकार में विदेश मंत्री रहे थे.
वर्ष 1969 में पहली बार केंद्र में औद्योगिक विकास उपमंत्री बने मुखर्जी ने कांग्रेस की विभिन्न सरकारों में कई ज़िम्मेदारियाँ निभाई हैं.
उनके ज़िम्मे अलग-अलग सरकारों में वित्त मंत्रालय, परिवहन और शिपिंग मंत्रालय, राजस्व और बैंकिंग, वाणिज्य मंत्रालय भी रहे हैं. बस एक महत्वपूर्ण मंत्रालय जो उन्हें नहीं मिला वो रहा गृह मंत्रालय.
इस समय वो लोकसभा में सदन के नेता भी हैं और सरकारी हलकों में उनकी तूती बोलती है. चाहे कोई भी मुद्दा हो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी उनसे सलाह मशविरा ज़रुर करते हैं.
वर्तमान सरकार में पिछले साल नटवर सिंह को विदेश मंत्री पद छोड़ना पड़ा था और इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह मंत्रालय किसी वरिष्ठ मंत्री को दिया जाएगा.
प्रधानमंत्री ने तीन बार विदेश मंत्री की नियुक्ति को लेकर आश्वासन दिया था लेकिन ख़बरें थीं कि प्रणव इस मंत्रालय के प्रति बहुत उत्साहित नहीं हैं.
उनके करीबी लोग बताते हैं कि प्रणव को न तो देश से बाहर यात्रा करना ही पसंद है और न ही घरेलू मसलों से खुद को दूर रखना चाहते हैं लेकिन शायद प्रधानमंत्री के आग्रह के कारण उन्हें यह ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी है.
विदेश मंत्री के तौर पर प्रणव मुखर्जी के सामने कई चुनौतियां होंगी और एक बार फिर इस दिग्गज की परीक्षा हो सकती है.
जानकारों का मानना है कि विदेश मंत्री के रुप में प्रणव मुखर्जी के कार्यकाल के दौरान यह देखना होगा कि वो वामपंथी दलों को अमरीका के साथ परमाणु समझौते और अन्य मुद्दों पर कैसे समझाते हैं.
साथ ही पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्तों की दिशा पर भी सबकी नज़र होगी.