मंगलवार, 24 अक्तूबर, 2006 को 19:45 GMT तक के समाचार
वरिष्ठ कांगेस नेता प्रणव मुखर्जी को विदेश मंत्रालय का कार्यभार सौंपा जाना कितना महत्वपूर्ण है और नए विदेश मंत्री के सामने क्या-क्या चुनौतियाँ हैं?
सामरिक मामलों के जानकार सिद्धार्थ वरदराजन का मानना है कि मनमोहन सिंह सरकार के नज़रिए से और भारत के नज़रिए से देखा जाए तो यह एक अहम कदम है.
उनका कहना है कि लगभग एक साल से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही विदेश मंत्रालय का काम देख रहे थे और अलग से कोई विदेश मंत्री नहीं था और इसके कोई अच्छे नतीजे नहीं हुए हैं.
वरदराजन का कहना है कि द्विपक्षीय रिश्तों के मामले में भारत सक्रिय भूमिक नहीं निभा पाया.
साथ ही वे मानते हैं कि कूटनीतिक स्तर पर जो महत्वपूर्ण काम भारत कर सकता था वो नहीं हो पाए हैं और यही कमी नीतियों में भी महसूस हो रही थी.
सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि इसी कारण से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर विदेश मंत्री नियुक्त करना का काफ़ी दबाव था और माना जा रहा था कि एक साल के बाद अब प्रधानमंत्री को कोई फ़ैसला करना ही चाहिए.
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ वरदराजन का कहना है कि प्रणव मुखर्जी ख़ुद विदेश मंत्रालय में जाना नहीं चाहते थे लेकिन उन्हें जाना ही पड़ा.
उनके अनुसार ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मुखर्जी की सरकार और गठबंधन के कारोबार को संभालने में अहम भूमिका रही है और उनकी राजनीतिक अहमियत तो है ही.
वे कहते हैं कि राजनीतिक दृष्टिकोण से मनमोहन सिंह इतने अनुभवी नेता नहीं है और भारत को जिस तरह की विदेश नीति की ज़रूरत है, उसके लिए सक्रिय विदेश मंत्री होना ज़रूरी था.
लेकिन काँग्रेस में किसी भी नाम पर सर्वसम्मति नहीं थी, चाहे एक-दो अन्य नामों पर भी विचार हुआ और मुखर्जी को विदेश मंत्रालय में जाना ही पड़ा.
विदेश मंत्री का दायित्व
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि आज के दिन विदेश मंत्रालय के लिए लगातार चुनौतियाँ आती रहती हैं.
कुछ प्रमुख मुद्दों की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि 'आतंकवाद' का सामना करने के विषय पर आगे कैसे बढ़ा जाए, चीन के साथ संबंध और बेहतर कैसे हों और अमरीका के साथ असैनिक परमाणु समझौता कुछ अहम मुद्दे हैं.
पूर्व विदेश सचिव शशांक से पूछा गया कि क्या विदेश मंत्री के होने से परिस्थियों कुछ और होतीं?
उनका कहा था कि मंत्रिमंडल की संयुक्त ज़िम्मेदारी तो होती ही है, लेकिन विदेश मंत्री की अपनी अहम भूमिका होती है.
विदेश मंत्री के दायित्वों में शिखर वार्ता के दौरान कूटनीति, कूटनीतिक दृष्टिकोण से अन्य देशों, विशेष तौर पर पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क साधना इसमें शामिल हैं.
ईमानदार छवि वाले एंटनी
रक्षा मंत्री बनाए गए, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी की ईमानदार नेता की छवी रही है वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के अनुसार यही उनकी सबसे बड़ी योग्यता है.
उनका मानना है कि रक्षा मंत्रालय ऐसा है कि भले ही मंत्री भ्रष्ट न हो लेकिन व्यवस्था ऐसी बनी हुई है जिसपर नियंत्रण पाना बहुत ज़रूरी है.
वरदराजन का कहना है कि रक्षा मंत्रालय के हथियारों संबंधित सौदों में ऐसा ढांचा बनाना ज़रूरी है जिससे इन सौदों में बिचौलियों और भ्रष्टाचार की भूमिका कम से कम किया जा सके.
सिद्धार्थ वरदराजन के मुताबिक कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि यदि रक्षा मंत्रालय की छवि सुधारनी है तो एंटनी से बेहतर व्यक्ति नहीं है.
हालाँकि उन्होंने ये भी कहा कि कुछ लोगों का मानना है कि एंटनी फ़ैसला आसानी से नहीं लेते लेकिन रक्षा मंत्री के लिए जल्द फ़ैसला करने की क्षमता होना ज़रूरी है.
वे कहते हैं कि आगे चल कर ही पता चलेगा कि एंटनी कैसे फ़ैसले लेते हैं.