मंगलवार, 17 अक्तूबर, 2006 को 09:43 GMT तक के समाचार
दिल्ली के प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड मामले में मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुख्य अभियुक्त संतोष सिंह को दोषी क़रार दिया गया है.
दीपावली और ईद की छुट्टियों के बाद अदालत संतोष सिंह को सज़ा सुनाएगी, अदालत ने संतोष सिंह को हत्या और बलात्कार दोनों आरोपों में दोषी पाया है.
संतोष सिंह को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.
जज आरएस सोढ़ी और जज पीके भसीन ने अपने फ़ैसले में कहा है कि 'मामलें में पहले हुए फ़ैसले ने इस अदालत को हैरत में डाल दिया और अभियुक्त को सज़ा देने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं'.
'न्याय की जीत'
प्रिददर्शिनी मट्टू के परिवार से जुड़े लोगों, न्याय के लिए अभियान चलाने वाले कार्यकर्ताओं और पुलिस अधिकारियों ने अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है और कहा है कि "न्याय की जीत हुई है."
प्रियदर्शिनी की सहेली इंदु जलाली ने फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि न्यायिक प्रणाली और मीडिया की जीत है.
उनका कहना था, "ये लोगों और मीडिया के दबाव और बेहतरीन जाँच का नतीजा है. हमें उम्मीद नहीं थी कि ये सब इतनी जल्दी हो पाएगा."
वहीं सीबीआई के वकील अशोक भान ने कहा कि उन्होंने अदालत से माँग की है कि संतोष सिंह को फाँसी की सज़ा होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने बहुत ही क्रूर तरीक़े से एक युवती के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या की थी.
सीबीआई के निदेशक विजय शंकर ने इस फ़ैसले को न्याय की जीत बताया है और इसे सीबीआई के लिए एक बड़ी सफलता बताया है.
हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त संतोष कुमार सिंह को 1999 में सबूतों के अभाव में निचली अदालत ने बरी कर दिया था.
मामला
प्रियदर्शिनी मट्टू की वर्ष 1996 में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी.उस समय प्रियदर्शिनी की उम्र 23 वर्ष थी.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि संतोष सिंह के डीएनए के नमूनों की जाँच से स्पष्ट हो गया है कि वे ही प्रियदर्शिनी मट्टू के हत्यारे हैं.
संतोष सिंह को 'सबूतों के अभाव में' बरी कर दिए जाने के बाद मीडिया ने इस मामले पर ज़ोरदार अभियान चलाया था जिसे दिल्ली के आम नागरिकों का भरपूर समर्थन मिला था.
कई लोगों ने मिलकर 'जस्टिस फ़ॉर प्रियदर्शिनी' नाम का एक गुट भी बनाया और मोमबत्ती जलाओ अभियान और ई-मेल अभियान भी शुरु किया था.
संतोष कुमार सिंह एक वकील हैं और भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र हैं.
जज ने इस मामले में जाँच अधिकारियों की आलोचना की है और कहा है कि मामले पर पिता के प्रभाव रहा है और जानबूझकर क़दम नहीं उठाए गए.
मीडिया में लगातार ऐसी ख़बरें छपती रही थीं कि संतोष सिंह अपने पिता के असर-रसूख की वजह से बरी हो गए थे.
छह साल बाद मामले की नए सिरे से सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय में शुरु हुई और सप्ताह में तीन दिन सुनवाई के आदेश दिए गए.
इसी तरह के एक और मामले-जेस्कि लाल हत्याकांड की जाँच भी दोबारा शुरू की गई है.