ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
भारत में जुलाई में हुए मुंबई बम धमाकों से जुड़े सात लोगों ने अपने बयान वापस ले लिए हैं.
पिछले हफ़्ते ही मुंबई पुलिस ने दावा किया था कि उसने इस मामले की गुत्थी को सुलझा लिया है.
धमाकों से जुड़े सात लोगों ने सोमवार को अदालत को बताया कि उन्होंने पुलिस के दबाव में आकर बयान दिए थे.
अदालत ने इन लोगों को 20 अक्तूबर तक न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दिया था.
पुलिस ने 16 लोगों को गिरफ़्तार किया था और दावा किया था कि धमाकों के पीछे पाकिस्तान की आईएसआई और दो अन्य चरमपंथी गुटों का हाथ है.
इस साल 11 जुलाई को लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 180 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और करीब 700 लोग घायल हो गए थे.
जुलाई में हुए मुंबई धमाकों से जुड़े सात लोगों के वकील शाहिद आज़मी ने कहा कि उनके मुव्वकिलों से ज़बरदस्ती कोरे पन्नों पर हस्ताक्षर करवाए गए.
शाहिद आज़मी के मुताबिक हस्ताक्षर लेने के समय उप आयुक्त रैंक का कोई पुलिस अधिकारी वहाँ मौजूद नहीं था.
ज़्यादातर लोगों को महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑरगेनाइज़ड क्राइम एक्ट यानी मकोका के तहत गिरफ़्तार किया गया था.
शाहिद आज़मी ने कहा, "पुलिस पहले से गिरफ़्तार किए गए लोगों को जानती थी. विभिन्न बम धमाकों में शामिल होने के शक में पुलिस इन लोगों को 2001 से लेकर 2006 के बीच कई बार पकड़ चुकी है और छोड़ चुकी है. लेकिन अब उन्हें राजनीतिक दबाव के कारण फिर पकड़ा गया है."
लेकिन पुलिस का कहना है कि उसके पास सभी आरोपी लोगों के खिलाफ़ सबूत हैं और मुक़दमे के तहत वो अदालत में इसे पेश करेगी.
बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद का कहना है कि जब मुंबई पुलिस ने धमाकों के लिए आईएसआई पर उँगली उठाई थी तो कई लोगों ने इस पर शक ज़ाहिर किया था.