रविवार, 08 अक्तूबर, 2006 को 18:07 GMT तक के समाचार
नागेंदर शर्मा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक का कहना है कि अफ़ज़ल गुरु को फाँसी देने से भारत-पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.
दूसरी ओर आतंकवाद विरोधी मोर्चे के नेता मनिंदरजीत सिंह बिट्टा का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को राजनैतिक हस्तक्षेप से बदलना कतई उचित नहीं है.
दोनों नेताओं ने आपकी बात बीबीसी के साथ कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए संसद पर हमले के मामले में अफ़ज़ल को फाँसी की सजा के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार व्यक्त किए.
जम्मू कश्मीर लिबरशेन फ्रंट के नेता यासीन मलिक ने कहा, "अफ़ज़ल को फाँसी देने से भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले दो वर्षों से जारी शांति प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. इसलिए कश्मीर विवाद और वहाँ की संवेदनशीलता को समझते हुए राष्ट्रपति को यह सजा माफ़ कर देनी चाहिए."
आशंका
उन्होंने आशंका जताई कि अफ़ज़ल को फाँसी होने पर उनसे प्रेरित होकर घाटी के युवा फिर से हथियार उठा सकते हैं.
दूसरी ओर बिट्टा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर सवाल उठाने की निंदा की. उन्होंने कहा, "सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला फिर से राजनैतिक दलों के हाथों मे चला जाए, यह अदालत का अपमान है. वोट की राजनीति है."
उन्होंने कहा, "मुंबई धमाकों में तो सबूत हैं कि इसमें आईएसआई का हाथ है. फिर शांति वार्ता का क्या मतलब. हमें इस तरह की शांति नहीं चाहिए "
यासीन मलिक ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर सवाल नहीं उठाना चाहते बल्कि कश्मीर की परिस्थितियों और भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों को ध्यान में रख कर ये माँग कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हमनें पाकिस्तान की जेल में फाँसी की सजा पाए भारतीय सरबजीत सिंह को भी माफ़ करने की माँग की. सिर्फ़ इसलिए कि उन्हें फाँसी से भारत के प्रधानमंत्री का हाथ कमज़ोर होगा."
कार्रवाई
बिट्टा ने पंजाब में आतंकवाद के दौर का हवाला देते हुए कहा कि खालिस्तान की माँग कर रहे लोगों के साथ उस समय की सरकार ने बिरले ही बात की और ऐसे तत्वों के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई से वहाँ अमन कायम हो गई.
उन्होंने कहा, "पंजाब में भी उस दौरान लगभग 36 हज़ार लोगों की जानें गई. लेकिन हमने कोई समझौता नहीं किया. नतीजा खालिस्तान सपना ही रहा गया. इसलिए कश्मीर पर झुकने का सवाल ही नहीं है. यह भारत का अभिन्न हिस्सा है."
जेकेएलएफ़ नेता यासीन मलिक ने संसद पर हमले के मामले का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस समय सभी हमलावर मारे गए.
उनका कहना है, "अफ़ज़ल को निचली अदालतों में वकील नहीं मिला. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से भी पता नहीं चलता है कि वह संसद पर हमले की साजिश या इसे अंजाम देने में शामिल नहीं था. इसलिए सजा माफ़ कर देनी चाहिए."