रविवार, 08 अक्तूबर, 2006 को 03:45 GMT तक के समाचार
नेपाल में दस साल से चल रहे माओवादी विद्रोह को ख़त्म करने के लिए उच्च स्तरीय शांति वार्ता रविवार को हुई. अब बातचीत मंगलवार को होगी.
प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के सरकारी निवास पर हुई इस बैठक में प्रधानमंत्री और माओवादी नेता प्रचंड शामिल हुए.
रविवार को सरकार और माओवादी विद्रोहियों के बीच हुई बातचीत के बाद जारी संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि बातचीत सदभावपूर्ण माहौल में हुई.
प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि हथियार के मुद्दे और पिछले समझौतों को लागू करने के मामले पर विचार-विमर्श हुआ.
अप्रैल में नेपाल के राजा ज्ञानेंद्र के ख़िलाफ़ हुए व्यापक प्रदर्शन के बाद जब से बहुदलीय सरकार ने सत्ता संभाली है माओवादियों ने संघर्ष विराम कर रखा है.
लेकिन राजनीतिक परिवर्तन और पूरी तरह शांति स्थापना की गति अभी भी बेहद धीमी है. इस बीच सरकार और माओवादियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी चलता रहा है.
संघर्ष विराम के बाद रविवार से दूसरे दौर की वार्ता शुरू हुई है और इस पर नेपाल का राजनीतिक भविष्य दाँव पर लगा हुआ है.
मुद्दे
इस वार्ता की तैयारी के लिए सरकार के मंत्रियों और माओवादियों के बीच हर रोज़ चर्चा होती रही है.
अभी भी बहुदलीय सरकार और माओवादियों के बीच मुद्दों का बड़ा फ़र्क नज़र आता है. और इनमें से एक मुद्दा राजशाही का भी है.
अप्रैल में संसद की बहाली के बाद से राजा के सारे अधिकार छीन लिए गए हैं लेकिन माओवादी चाहते हैं कि राजशाही को ख़त्म ही कर दिया जाए और इसके लिए अगले साल नेपाल में जनमतसंग्रह करवाया जाए.
लेकिन दूसरी ओर बहुदलीय सरकार के मुख्य घटक दल नेपाली कांग्रस का कहना है कि राजा को एक अलंकारिक पद पर रहने दिया जाना चाहिए.
मतभेद का दूसरा मुद्दा माओवादी विद्रोहियों के हथियार हैं.
राजनीतिज्ञों का कहना है कि इससे पहले कि माओवादी अंतरिम सरकार का हिस्सा बनें, उन्हें हथियार छोड़ देने चाहिए लेकिन दूसरी ओर माओवादी इससे इनकार करते रहे हैं.
माओवादी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि जून में पहले दौर की शांतिवार्ता के बाद जो सहमति बनी थी, सरकार उसका पालन नहीं कर रही है.
उनका कहना है कि हथियार छोड़ने के लिए कहने से पहले उन्हें सरकार में शामिल किया जाना चाहिए.
उधर सरकार का आरोप है कि माओवादी अभी भी अपहरण और हत्याएँ कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री जीपी कोइराला का कहना है कि इस मुद्दे पर सहमति बनाने के लिए लंबी बातचीत की ज़रुरत होगी.
दूसरी ओर माओवादी यह तो कहते हैं कि वे विद्रोह के रास्ते पर नहीं लौटेंगे लेकिन उनका कहना है कि यदि वार्ता असफल रही तो वे विरोध प्रदर्शन करेंगे.