शनिवार, 07 अक्तूबर, 2006 को 14:38 GMT तक के समाचार
नेपाल में माओवादी हिंसा ख़त्म करने के लिए शांति वार्ता रविवार से शुरू हो रही है. अप्रैल में राजा ज्ञानेंद्र के प्रत्यक्ष शासन के ख़ात्मे और संघर्षविराम लागू होने के बावजूद शांति प्रक्रिया की गति धीमी रही है.
लेकिन अब शीर्ष स्तर पर शुरू हुई शांति वार्ता से काफ़ी उम्मीदें हैं. काठमांडू से बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैविलैंड का कहना है कि आम धारणा ये है कि नेपाल की शांति प्रक्रिया ठंडी पड़ चुकी है.
ऐसे में रविवार से शुरू होने वाली वार्ताओं से बड़ी उम्मीदें की जा रही हैं. शांति वार्ता का आधार तैयार करने के लिए मंत्रियों और विद्रोहियों की बैठकें रोज़ होती रही हैं.
लेकिन रास्ते आसान नहीं हैं. अभी भी विद्रोहियों और बहुदलीय सरकार के बीच बहुत मतभेद हैं. एक बड़ा मतभेद राजशाही को लेकर है.
नेपाल नरेश के अधिकार तो पहले ही छीन लिए गए हैं लेकिन अब माओवादी विद्रोही चाहते हैं कि राजशाही को स्थगित करके अगले साल उसके भविष्य के बारे में जनमत संग्रह कराया जाए.
राजशाही पर विवाद
इसके विपरीत सत्तारूढ गंठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस का कहना है कि फ़िलहाल नेपाल नरेश की औपचारिक भूमिका बनी रहने दी जाए.
दूसरा मतभेद का मुद्दा विद्रोहियों के हथियारों का है. सरकार का कहना है कि अंतरिम सरकार में शामिल होने से पहले विद्रोहियों को अपने हथियार डाल देने चाहिए.
लेकिन विद्रोहियों को ये मंज़ूर नहीं है. वे सरकार पर आरोप लगाते हैं कि सरकार जून में हुए उस समझौते से मुकर रही है जिसमें विद्रोहियों को जल्दी ही सरकार में शामिल करने की बात कही गई थी और पहले हथियार डालने की कोई शर्त नहीं थी.
सरकार का कहना है कि अपहरण, पैसा वसूली और हत्या की घटनाएँ लगातार हो रही हैं और नेपाल की जनता शांति चाहती है.
पिछले सप्ताह नेपाल नरेश ने भी कहा था कि शांति प्रक्रिया की सफलता राष्ट्र की ज़रूरत है. लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा है कि मतभेदों को समाप्त करने के लिए लंबी वार्ताओं की ज़रूरत है.
विद्रोहियों ने कहा है कि वे फिर से लड़ाई तो नहीं छेड़ेंगे लेकिन अगर ये शांति वार्ताएँ असफल रहीं तो राजधानी में तगड़े विरोध प्रदर्शन किए जाएँगे.