शनिवार, 07 अक्तूबर, 2006 को 13:05 GMT तक के समाचार
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल
ऐसा लगता है कि जो काम जेल की कठोर सज़ा और सुधारों पर अधिकारियों लंबे भाषण नहीं कर पाए, वही शायद अब फ़िल्म ‘मुन्नाभाई लगे रहो’ के ‘मुन्नाभाई’ और ‘सर्किट’ करके दिखाएंगे.
मध्यप्रदेश की 116 जेलों के 32 हज़ार क़ैदियों में सत्य और अहिंसा के प्रति रुचि जगाने के लिए उन्हें बंदी कल्याण दिवस पर फ़िल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ दिखाई जाएगी.
मध्य प्रदेश के जेल महानिदेशक आरके दिवाकर का कहना है कि इससे न सिर्फ़ क़ैदियों का मनोरंजन होगा बल्कि अगर वह इस फ़िल्म के कारण गाँधीवाद का एक अंश भी आत्मसात कर पाए तो बड़ी बात होगी, उनके कै़दी जीवन और उसके बाद की ज़िंदगी के लिए भी.
आरके दिवाकर ने परिवार के आग्रह पर ख़ुद भी लगे रहो मुन्ना भाई लगभग 15 दिन पहले देखी और पाया कि इसमें महात्मा गाँधी की जीवन शैली और सोच को एक नए तरीके से पेश किया गया है जो उनके कै़दियों को भी प्रभावित कर सकती है.
जेल में गाँधीजी के दर्शन को चित्रित करती इस फ़िल्म की चर्चा हर तरफ़ हो रही है.
ग्वालियर जेल में उम्र कै़द काट रहे जितेंद्र जायसवाल को हालाँकि फ़िल्मों में दिलचस्पी नहीं है लेकिन वह लगो रहो मुन्नाभाई का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.
भोपाल जेल के दीपक कुमार ने इस फ़िल्म के बारे में ख़बरों में पढ़ा है और जाना है कि मुन्नाभाई क्वि्ज़ में हिस्सा लेने के बाद ‘गाँधीगिरी’ में रुचि लेने लगता है.
वह नहीं मानते कि सत्य और अहिंसा का प्रचार-प्रसार ठीक प्रकार से नहीं हो पाया है. आख़िर इस फ़िल्म को ख्याति ही इस कारण मिल पा रही है कि वह इन दोनों दर्शन के बारे में बात करती है.
छह साल से रीवा सेंट्रल जेल में सज़ा काट रहे मानतु साव का कहना है, "आप चाहे कितनी भी हिंसा कर लो, आपका अंत और शांति वहीं मिलेगी- अहिंसा में."
मानतु साव हत्या के आरोप में उम्र क़ैद की सज़ा रीवा सेंट्रल जेल में काट रहे हैं जहाँ लगे रहो मुन्ना भाई गाँधी जयंती पर दिखाई गई थी.