शनिवार, 07 अक्तूबर, 2006 को 08:16 GMT तक के समाचार
भूकंप पीड़ित इलाक़ों से सुशीला सिंह
बीबीसी संवाददाता
पैंतीस साल की विधवा नसीबा अख़्तर ने ये कभी नहीं सोचा था कि 8 अक्तूबर की सुबह उसकी जिंदगी में हमेशा के लिए ख़ालीपन लेकर आएगी.
पति उस दिन गाय के लिए घास लेने गया था पहाड पर लेकिन वापिस लौट कर नहीं आया दो दिन बाद लाश मलबे में मिली.
पाँच बच्चों की इस माँ ने भूकंप के पाँच दिन बाद अपनी पाँच साल की बच्ची को भी खो दिया.
सरकार की तरफ से सिर्फ 50 हज़ार रुपये मुआवज़े के मिले हैं और कोई ठौर नहीं बस घर के नाम पर ये टीन शेड्स एक कमरा भर है.
वे बताती हैं, “खाने के लिए आस-पास की ज़मीन में मक्का उगा लिया था जो गाय को भी डाल देती हूँ और मेरा परिवार भी खा लेता है.”
नसीबा अपने शौहर का शव पाने में कामयाब रही.
लेकिन 40 साल की परवीना को ये सुख भी नसीब नहीं हुआ.
वो याद करती हैं, “मेरे पति घास लेने गये थे, मैंने, मेरे बच्चों, लोगों और तो और सेना ने भी बहुत खोजा लेकिन मैं उनके शव का देख भी नहीं पाई.शायद उनका शव झेलम में बह गया.”
परवीना बताती हैं कि उनके नौ बच्चे हैं.
उनकी बड़ी बेटी को पति ने छोड दिया है. उसकी भी एक छोटी बेटी है.
वे कहती हैं, “सरकार ने अब तक मुआवज़े के 50 हज़ार रुपए दिए हैं उन्हीं से घर चल रहा है जब वो पैसा ख़त्म हो जाएगा तब क्या करुँगी?”
श्रीनगर के एक मदरसे दारुल उलुम बिलालिया ने परवीना के लिए दो कमरों का घर बनवा दिया है.
लेकिन 32 साल की मक़सूदा को अभी भी एक छत का इंतज़ार है.
मक़सूदा अपने भाग्य को कोसती हैं कि क्यों उनका जन्म हुआ.
चार बच्चों की इस माँ को भूकंप के छह महीने बाद बेटा पैदा हुआ. मक़सूदा की बड़ी बेटी नौ साल की है.
एक गाँव-13 विधवाएँ
ये सब सुलतान डकी गाँव की रहने वाली हैं.
सुलतान डकी गाँव की 13 महिलाओं को भूकंप ने विधवा बना दिया और बच्चों पर से बाप का साया उठा दिया.
ये पहाड़ी इलाक़ा नियंत्रण रेखा से काफी क़रीब है.
कश्मीर की एक ट्रस्ट दारुल ऊलुम बिलालिया मदरसा भी चलाती हैं अब ये ऊडी, कमलकोट और सुलतान डकी गाँव में भूकंप की वजह से विधवा हो गई महिलाओं के लिए मकान बना रही है.
पिछले साल आए भूकंप में 96 महिलाएँ अपने पति को खो चुकी हैं.
कश्मीर के डिवज़नल कमीश्नर बशरत अहमद डार का कहना जो लोग इस भूकंप में जो लोग मारे गए हैं उनके परिवारवालों को राज्य सरकार ने 50 हज़ार मुआवज़ा देने की बात कही थी जो पूरा दिया जा चुका है.
विधवाओं को अलग से दस हज़ार रुपए और दिए गए थे.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब यहाँ आए थे तो उन्होंने मृतकों के परिजनों को एक लाख की अतिरिक्त राशि का वायदा किया था.
अधिकारी बताते हैं कि अभी इस राशि के लिए कागज़ी कार्रवाई चल रही है.
अब ठंड के दिन आ रहे हैं और विधवा हो गई इन महिलाओं के सामने समस्या है कि वे खाने-पीने का सामान और पैसा ख़त्म हो जाने के बाद क्या करेंगी.
न इसका जवाब सरकार के पास है और न किसी और के पास.