शनिवार, 23 सितंबर, 2006 को 04:54 GMT तक के समाचार
भारत सरकार ने असम के अलगाववादी गुट उल्फ़ा को साफ़ कह दिया है कि यदि वे सीधी बातचीत का लिखित आश्वासन नहीं देते हैं तो संघर्षविराम आगे नहीं बढ़ेगा.
प्रतिबंधित संगठन उल्फ़ा के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों की कार्रवाई गत 13 अगस्त को रोक दी गई थी और उसे चार बार आगे बढ़ाया जा चुका था. बुधवार को इसकी अवधि ख़त्म हो गई.
केंद्र सरकार के इस निर्णय को असम में चल रही शांतिप्रक्रिया के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
उल्लेखनीय है कि उल्फ़ा माँग कर रहा है कि केंद्र सरकार उनके पाँच शीर्ष नेताओं को रिहा करे जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पहले उल्फ़ा लिखित में यह आश्वासन दे कि वह केंद्र सरकार के साथ मध्यस्थों की उपस्थिति में सीधी बातचीत करेगा.
केंद्र सरकार और उल्फ़ा के प्रतिनिधियों के बीच पहली बातचीत पिछले साल अक्तूबर में शुरू हुई थी.
यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम यानी उल्फ़ा ने माँग की थी कि केंद्र सरकार सीधी बातचीत से पहले भारतीय सेना की कार्रवाई पर रोक लगाए.
थोड़ी मोहलत भी
केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने उल्फ़ा और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहीं लेखिका इंदिरा गोस्वामी को शुक्रवार को संघर्षविराम आगे न बढ़ाने की सूचना दे दी है.
यह फ़ैसला करने से पहले सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने केंद्रीय गृहसचिव वीके दुग्गल के साथ कई बैठकें कीं.
इंदिरा गोस्वामी असम के नागरिक समाज की ओर से गठित 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' का नेतृत्व कर रही हैं. यह ग्रुप केंद्र सरकार और उल्फ़ा के बीच मध्यस्थता कर रहा है.
इंदिरा गोस्वामी ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि 'पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप' किसी भी पक्ष पर यह दबाव नहीं डाल सकता कि शांतिप्रक्रिया जारी रखा जाए वह केवल संदेश वाहक का काम कर रहा है.
इंदिरा गोस्वामी ने बीबीसी से हुई बातचीत में बताया, "एमके नारायण ने आश्वासन दिया है कि केंद्र सरकार कार्रवाई शुरु करने से पहले कुछ दिन इंतज़ार करेगी."
माना जा रहा है केंद्र सरकार पर सेना सहित विभिन्न एजेंसियों की ओर से दबाव था कि संघर्षविराम को आगे न बढ़ाया जाए.
इन एजेंसियों का कहना था कि संघर्षविराम का उपयोग उल्फ़ा अपनी ताक़त बढ़ाने और पैसा उगाही के लिए कर रहा है.