बुधवार, 20 सितंबर, 2006 को 18:16 GMT तक के समाचार
ज़ुबैर अहमद
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
भारत की वाणिज्यिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई शहर में 1993 के बम धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों और जीवित बचे लोगों में कुछ राहत देखी जा रही है कि आख़िरकार न्यायालय का फ़ैसला आ रहा है.
लेकिन देश में हज़ारों ऐसे प्रभावित लोग हैं जिन्हें वर्षों से अब भी न्याय का इंतज़ार है और उनमें ख़ासतौर से सांप्रदायिक हिंसा के शिकार काफ़ी लोग हैं.
ऐसे बहुत से मामले हैं जिनकी सुनवाई में मुंबई बम धमाकों से भी ज़्यादा लंबा समय लगा है लेकिन अभी तक उनका कोई फ़ैसला नहीं आया है.
देश के अल्पसंख्यक समुदायो - मुस्लिम और सिख में बहुत से लोगों में न्याय में हो रही देरी पर कुंठा है और उनका कहना है कि यह देरी दिखाती है कि उनके ख़िलाफ़ भेदभाव होता है जो काफ़ी गहराई से बैठा हुआ है.
मुंबई बम धमाकों के मुक़दमे में दोषी ठहराने वाले फ़ैसला का पूरे देश में व्यापक तौर पर स्वागत किया गया लेकिन ख़ासतौर से मुंबई के माहीम इलाक़े में यह स्वागत नहीं देखा गया. उस इलाक़े में अधिकांश आबादी मुसलमानों की है.
माहीम इलाक़े में ही मेमन परिवार रहता था. इसी परिवार के चार सदस्यों को दोषी क़रार दिया गया है जबकि बाक़ी को कई वर्ष जेलों में काटने के बाद रिहा कर दिया गया है.
इस इलाक़े के लोगों में इस फ़ैसले पर आश्चर्य का माहौल था. एक महिला आबिदा सिद्दीकी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "भले ही अदालत ने मेमन सदस्यों को दोषी ठहराने का यह फ़ैसला सुना दिया है, हम नहीं मानते कि वे बम धमाकों में शामिल थे. वो एक खाता-पीता और दरियादिल परिवार रहा है."
आबिदा की एक रिश्तेदार हुर्रियत सिद्दीकी का सवाल था कि जो लोग 1993 में बम धमाकों से पहले महीनों तक चले सांप्रदायिक हिंसा में शामिल थे, उनके मुक़दमे का फ़ैसला कब सुनाया जाएगा.
ऐसे आरोप हैं कि मुंबई धमाकों की योजना मुसलमानों की बहुलता वाले माफ़िया गुटों ने बनाई थी और ऐसा उन्होंने हिंदू-मुस्लिम हिंसा का बदला लेने के इरादे से किया था.
ग़ौरतलब है कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद अनेक स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे और मुंबई में वे दंगे कई महीने तक चले थे. देश भर में उस हिंसा में दो हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
मुंबई में काफ़ी भीषण दंगे हुए थे और उनमें मारे गए लोगों में ज़्यादातर मुसलमान थे जिन्हें कथित तौर पर हिंदू भीड़ ने मारा था. पुलिस पर आरोप लगे थे कि वह मुसलमानों की रक्षा करने के लिए समय पर कार्रवाई करने में नाकाम रही थी.
एक हिंदूवादी नेता पर अयोध्या में हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया था लेकिन उस मामले में अभी किसी पर कोई आरोप निर्धारित नहीं किए गए हैं.
मुंबई दंगों की जाँच के लिए श्रीकृष्ण आयोग गठित किया गया था जिसने दोषियों की शिनाख़्त की थी लेकिन आज तक किसी को नहीं पकड़ा गया है.
'उदासीनता'
सिखों का भी कहना है कि उन्हें भी न्याय से वंचित किया गया है.
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे जिनमें तीन हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. उनमें से ज़्यादातर परिवार उन दंगों के 22 साल बाद भी न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं.
इन दंगों की जाँच के लिए कुल मिलाकर नौ जाँच समितियाँ या आयोग बनाए गए. उन्होंने दंगों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के नाम बताए हैं जिनमें कुछ नेता भी हैं, मगर अभी किसी को भी न्यायालय से सज़ा नहीं मिली है.
लगभग सभी मामलों में कोई ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने के पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नज़र आती है.
सिख विरोधी दंगों की जाँच के लिए नवें और अंतिम नानावती आयोग की रिपोर्ट के बाद कांग्रेस पार्टी ने संबंधित राज्य सरकारों से उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा जो दंगों में शामिल थे. जिन लोगों के नाम लिए गए उनमें ख़ुद कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी थे.
लेकिन सरकारी उदासीनता या जैसाकि कुछ लोग कहते हैं, भेदभाव और पूर्वाग्रह की भावना पार्टियों की सीमाएँ भी पार कर गए हैं.
मुंबई में मुसलमानों में कुंठा नज़र आती है और इसकी वजह वे बताते हैं कि लगातार आने वाली सरकारों ने श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट के प्रति उदासीनता ही दिखाई है.
जिस समय श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट सौंपी गई थी तब महाराष्ट्र में शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार थी लेकिन इस रिपोर्ट को किसी भी सरकार ने स्वीकार नहीं किया है. राज्य में अब कांग्रेस सरकार के दौरान भी ऐसा नहीं हुआ है.
लंबी सूची
इस तरह के संवेदनशील मामलों की सूची काफ़ी लंबी है. मेरठ के हाशिमपुरा का मामला लें जहाँ 19 साल पहले मुसलमानों की निर्दयतापूर्वक हत्या की गई थी. उस मामले में 19 पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज किए गए थे लेकिन उनमें कोई नतीजा नहीं निकल सका है.
अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने वो मुक़दमे दिल्ली स्थानांतरित करने के आदेश दिए हैं. इस बीच अभियुक्त अधिकारी अब भी नौकरी कर रहे हैं.
यह तो सही है कि लोग इस तरह के मुक़दमों की सुनवाई के लिए, चाहें तो ख़ुद के वकील नियुक्त कर सकते हैं, मगर ऐसे मामलों में ग़रीब और अशिक्षित लोग प्रभावित होते हैं जो साल दर साल चलने वाले मुक़दमों का क़ानूनी ख़र्च नहीं उठा सकते.
बिहार के भागलपुर में 1989 में हुए सांप्रदायिक दंगों का मामला भी ऐसा है. विभिन्न सरकारें बदली हैं लेकिन न्याय का अब भी इंतज़ार है.
तो, दोष किसका है? जानकारों का कहना है कि सरकारी वकील ऐसे मामलों में अक्सर मुस्तैदी नहीं दिखाते और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी हर तरफ़ नज़र आती है.