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उपासना भट
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

गोद लेने पर भी मातृत्व अवकाश

भारत सरकार के एक आदेशानुसार अब एक वर्ष तक के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश दिया जाएगा.

आदेश के मुताबिक़ बच्चे गोद लेने वाली माँ को भी जन्म देने वाली माँ की तरह ही 135 दिन की छुट्टी दी जाएगी जिससे वो बच्चे की ठीक तरह से देखभाल कर सके और माँ और बच्चों का संबंध क़ायम कर सके.

लंबे समय से बच्चे गोद लेने वाले कई माता-पिता 'आत्मजा' नाम के एक संगठन के बैनर तले इस मातृत्व अधिकार के लिए प्रयास कर रहे थे.

'आत्मजा' की मुखिया नीलांजना गुप्ता ने कहा कि गोद लिए गए बच्चे और माँ के बीच आत्मीय और भावनात्मक संबंध बनने में समय लगता है इसलिए माँ को अवकाश मिलना ही चाहिए.

संगठन की कई महिलाओं ने अपने गोद लिए बच्चे के साथ रहने के लिए अवैतनिक अवकाश तक ले लिया था.

जादवपुर विश्वविद्यालय में पढ़ा रही नीलांजना ने कहा, "जब मैं अपनी सात माह की गोद ली हुई अनन्या को छोड़कर काम पर जाने लगी तो उसने अपनी छोटी-छोटी हथेलियों से मेरे कपड़े पकड़ लिए और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी."

नीलांजना ने बताया कि घर आने के पहले दो-तीन महीनों तक अनन्या न ठीक से हँसना जानती थी और न ही रोना.

वो तो यह भी नहीं जानती थी कि उसके रोने पर उसकी माँ दौड़ी चली आएगी. ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि उसने कभी माँ की ममता महसूस तक नहीं की थी.

बचपन की चिंता

नीलांजना ने बताया कि गोद लिए हुए बच्चों की यदि शुरुआती दौर में ही ठीक तरह से देखभाल नहीं की जाती तो वो कई तरह की बीमारियों से घिर जाते हैं और कुपोषण का भी शिकार होते हैं.

सरकार के निर्णय का स्वागत करते हुए गुप्ता ने कहा, "गोद लिए गए बच्चे की उम्र के हिसाब से मातृत्व अवकाश देना बेमतलब है. गोद लिए गए ज़्यादा उम्र के बच्चे को तो नए परिवार में अपने को सहज बनाने में और भी ज़्यादा समय लगता है. इन बच्चों में पैदा हुई असुरक्षा की भावना को माता-पिता के प्यार-दुलार से ही ख़त्म किया जा सकता है."

एक आकलन के अनुसार भारत में हर वर्ष क़रीब 3000 बच्चों को गोद लिया जाता है जबकि देश में अनाथ बच्चों की संख्या एक करोड़ 20 लाख है.

'कैटेलिस्ट फ़ॉर सोशल ऐक्शन' से जुड़ी भारती दासगुप्ता का कहना है कि गोद लेते समय की जाने वाली क़ानूनी प्रकिया को सरल बनाया जाना चाहिए.

वर्तमान व्यवस्था में भारत में एक बच्चा गोद लेने में छह महीने से दो वर्ष तक का समय लग जाता है.

नीलांजना के मुताबिक़ भारत में बच्चा गोद लेने वालों की संख्या बढ़ी है लेकिन आज भी इसे परिवारों में वरीयता नहीं दी जाती.

उन्होंने कहा कि भारत में लोगों को इस स्तर पर जागरुक करने की ज़रूरत है कि वो बच्चों को गोद लेने को एक बेहतर विकल्प समझें.