शुक्रवार, 15 सितंबर, 2006 को 10:59 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
रियासती काल के शाही शानो शौक़त के दिन भले ही बीत गए हों लेकिन जयपुर के एक वकील गजेंद्र उपाध्याय को अपने घर से अदालत का सफ़र तय करने के लिए शाही सवारी ही पसंद है.
वो प्रतिदिन घोड़ी पर सवार होकर ही अदालत पहुँचते हैं.
अपनी प्रिय घोड़ी 'लीलण' पर सवार होकर जब गजेंद्र उपाध्याय अदालत का रुख़ करते हैं तो लोग उन्हें कौतुहल के साथ देखते हैं.
उन्हें अपनी इस सवारी पर बहुत गर्व है. वे कहते हैं, "यह शाही सवारी है, इसकी चमक के आगे सारी विलायती गाड़ियाँ फीकी हैं."
वैसे भी घोड़ा एक वफ़ादार जानवर है. छबीली मूछें और सिर पर हैट पहने उपाध्याय घोड़ी पर बैठकर निकलते हैं तो तो लोग ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता देने लगते हैं.
उपाध्याय कहते हैं कि उनके परिवार में घुड़सवारी की परंपरा रही है इसीलिए वे 10 वर्षों से घोड़ी को ही अपने परिवहन का साधन बनाए हुए हैं.
अपनी घोड़ी की पीठ पर हाथ फिराकर वो कहते हैं, "यह ऐसी सवारी है जो ट्राफ़िक जाम में नहीं फंसती. इसमें यांत्रिक ख़राबी का भी कोई चक्कर नहीं है. लोग घोड़ी की टापों की आवाज़ सुनकर ख़ुद ही रास्ता दे देते हैं."
ख़ास सवारी
जयपुर की ज़िला अदालतों में कोई तीन हज़ार वकील पंजीकृत हैं लेकिन उपाध्याय ही ऐसे हैं जो प्रतिदिन घोड़ी पर सवार होकर कचहरी पहुंचते हैं.
एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर सुनील शर्मा कहते हैं हम सभी वकीलों को गजेंद्र उपाध्याय का घोड़ी पर चढ़कर आना अच्छा लगता है लेकिन घोड़ी के लिए वहाँ पार्किंग की समस्या है.
उपाध्याय अदालत परिसर में अपनी घोड़ी के लिए पार्किंग व्यवस्था की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें घर से कचहरी तक आने में 15 मिनट का समय लगता है.
वो कहते हैं, "जो शान और सुख इस शाही सवारी में है, वो चमचमाती मसर्डीज जैसी कारों में कहाँ."
बहरहाल, उपाध्याय जयपुर की उस दौर की याद दिला जाते हैं जब राजमार्ग और बाज़ारों में राजे-महराजे अपने लाव-लश्कर और शाही सवारियों के साथ निकलते थे.