गुरुवार, 07 सितंबर, 2006 को 10:03 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
कोलकाता के भूषण हालदार ने पिछले 21 अगस्त को ही अपना सौंवा जन्मदिन मनाया है.
कम से कम कोलकाता में फिलहाल अकेले ऐसे वकील हैं जो देश की आजादी के पहले से वकालत कर रहे हैं, कलकत्ता हाइकोर्ट की बार काउंसिल के पंजीकरण रजिस्टर में भूषण बाबू की जन्म तिथि के आगे दर्ज है 21 अगस्त 1906.
खान-पान में संयम रखने और रोज़ मार्निंग वॉक करने वाले हालदार साहब अब भी नियमित तौर पर अपने मामलों की पैरवी करने अदालत में जाते हैं.
देश की आजादी के पहले से लेकर अब तक इस पेशे में क्या बदलाव आए हैं? इस सवाल पर वे कहते हैं कि "अँग्रेजों के राज में वकील बनना आसान नहीं था. अब तो हर कोई कानून की डिग्री लेकर रजिस्ट्रेशन कराने के बाद वकील बन जाता है. अंग्रजों के शासनकाल में न्याय प्रक्रिया काफी सरल थी और मुकदमों का निपटारा जल्दी ही हो जाता था."
भूषण कहते हैं कि वर्ष 1937 में कानून की डिग्री लेने के बाद वे साल भर तक प्रोबेशनर रहे और फिर आठ साल तक वरिष्ठ वकीलों के तहत काम किया.
वे बताते हैं कि "इसके बाद मैंने तत्कालीन जिला जज विलियम डगलस को स्वतंत्र रूप से वकालत का अधिकार देने की लिए एक आवेदन भेजा. उन्होंने उसे हाईकोर्ट को भेज दिया. हाईकोर्ट ने कड़ी जाँच-परख के बाद वकालत करने की मंजूरी दे दी."
लंबा सफ़र
दक्षिण 24-परगना जिले के ताजपुर गाँव में जन्मे भूषण ने 1936 में वकालत की डिग्री हासिल की. और उसी साल से वकील के तौर पर उनका सफर शुरू हो गया.
उनका जन्म जमींदार के घर में हुआ था. पिता के दबाव में ही उन्होंने वकालत पढ़ने का फैसला किया. पिता की दलील थी कि "कानून नहीं समझोगे तो अपनी ज़मीन-ज़ायदाद की देखभाल कैसे करोगे?"
अपने बेटों, बहुओं और पोते-पोतियों से भरे घर में रहने वाले हालदार पिछले 38 वर्षों से मधुमेह के रोगी हैं लेकिन नियमित दिनचर्या और संयम की वजह से उनका स्वास्थ्य सामान्य तौर पर ठीक रहता है और इस उम्र में भी उनमें काफ़ी जोश है.
लेकिन सौ साल की उम्र में भी भूषण बाबू की दिनचर्या नहीं बदली है. अपने घर पर कानून की मोटी-मोटी किताबों में उलझे रहने के बाद वे सुबह ठीक समय पर अदालत में पहुँच जाते हैं.
वक़्त के पाबंद
उनके साथ काम कर चुके एक वकील दिलीप दत्त बताते हैं कि "बीते 22 वर्षों से मैंने भूषण बाबू को हमेशा समय पर अदालत पहुंचते देखा है. इस उम्र में भी समय का इतना पाबंद होना बहुत आश्चर्यजनक है."
भूषण के बेटे रमेन हालदार कहते हैं कि ‘पिताजी अपने काम में दूसरों की सहायता लेना पसंद नहीं करते. मुकदमे की पैरवी के लिए दलीलें जुटाने की खातिर वे अब भी अपनी लाइब्रेरी में रखी कानून की मोटी-मोटी पुस्तकों में दिमाग खपाते रहते हैं.’
अपने मुवक्किल के मुकदमों की पैरवी के लिए. अब तक कितने केस लड़े हैं, यह तो उनको ठीक से याद नहीं. लेकिन कहते हैं कि "अभी मुझे कई केस लड़ने हैं. जब तक सांस चलती रहेगी, अदालत में बहस का सिलसिला नहीं टूटेगा."