शुक्रवार, 01 सितंबर, 2006 को 14:10 GMT तक के समाचार
श्याम सुंदर
बीबीसी संवाददाता, बाड़मेर से
“पानी जब पहाडों से आता है तो कल-कल छल-छल करता आता है पर यहाँ पानी आया तो रेत पर साँप की तरह रेंगता, बिल्कुल ख़ामोशी से और निगल गया सब कुछ.”
ये है मलवा गांव के रहने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी मुराद अली की टिप्पणी.
जैसलमेर और बाड़मेर के रेगिस्तान में आई बाढ़ से जुड़ी कितनी ही ऐसी कहानियाँ सुनने को मिलीं जिनसे साफ़ था कि यहाँ के लोगों को आने वाले विपत्ति का अनुमान ही नही था.
प्रशासन ने ख़तरे की चेतावनी कुछ इलाकों मे अवश्य दी थी पर इस तरह के विनाश का अनुमान शायद उसे भी नहीं था.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने दबी ज़ुबान में बताया कि उन्होंने सोचा था कि "बहुत होगा तो 5-7 फुट पानी आ जाएगा, और क्या." सोचा यही गया कि लोग टीलों पर चले जाएँगे, लेकिन हो कुछ और ही गया.
आधिकारिक तौर पर इस त्रासदी मे 100 से ज़्यादा लोग मारे गए जबकि हज़ारों लोग बेघर हो गए.
दूर तक फैले पानी से ज़्यादातर इंसानी लाशों को निकाल लिया गया है लेकिन हज़ारों मवेशियों की लाशें अभी भी पानी मे सड़ रही हैं.
कई किलोमीटर दूर तक सडांध फैल रही है हालाँकि अभी जो लोग डॉक्टरों के पास आ रहे हैं वो त्वचा या पेट ख़राब होने की शिकायत ले कर ही आ रहे हैं और किसी गंभीर बीमारी के लक्षण दिखाई नही दे रहे हैं.
लेकिन डॉक्टरों को डर है कि यहाँ जमा पानी को निकालने का इंतज़ाम जल्दी ही नही किया गया तो हालात बिगड़ सकते हैं.
रेगिस्तान मे मीलों तक फैले पानी के सामने प्रशासन भी लाचार है. बाढ़ग्रस्त इलाकों में राहत के काम की ज़िम्मेदारी संभाल रहे ललित के पंवार कुछ देर कुशल नौकरशाह की तरह बात गोलमोल करते हैं पर अंततः मानते हैं कि ये काम आसान नहीं, अगर पंपों से भी पानी निकाला जाता है तो लंबा समय लगेगा.
अभी जो हालात यहाँ हैं उसमे एक ही समाधान नज़र आता है कि इस बाढ़ में तबाह हुए गाँवों और बस्तियों को नए सिरे से बसाया जाए.
प्रशासन के इसी उहापोह के बीच बेघर हुए लोगों में असंतोष भी बढ़ रहा है. इन लोगों का कहना है कि इस आपदा के समय बचाव का काम जैसा भी रहा हो, लेकिन सरकार उन्हें ये नहीं बता पा रही है कि अब उसकी क्या योजना है.
बाढ़ में बेघर हुए लोगों में शायद कम ही लोग हैं जो दूसरी जगह बसने पर आपत्ति कर रहे हों.
राजनीति
काँग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा किया और विस्थापितों का हाल-चाल पूछा. इस दौरान उन्हें कुछ नारेबाज़ी का भी सामना करना पड़ा.
ऐसा ही कुछ मुख्यमंत्री वसुंधराराजे को भी झेलना पड़ा था. आपदा के समय ऐसा होना आम बात है, आपदा मे फँसे बेबस लोगों का गुस्सा ऐसे मौकों पर राजनीतिक नेतृत्व पर ही निकलता है.
लेकिन इसके साथ ही ये भी सही है की ऐसे मौक़े पर नेताओं का लोगों से मिलना, उन्हें आश्वासन देना मरहम का काम भी करता है. लेकिन रेगिस्तान में आई इस बाढ़ पर जिस तरह कि बयानबाज़ी केंद्र और राज्य सरकार के नेताओं के बीच हुई, और चल भी रही है, उससे साफ़ है कि बाढ़ पीड़ितों की चिंता के अलावा एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशें चल रही हैं.
इस बात का एहसास राहत और बचाव कार्यों का जायज़ा लेते हुए भी हो जाता है. अलग-अलग दलों के कार्यकर्ता अलग-अलग ढंग से तस्वीर पेश करते हैं. पत्रकारों के लिए इनके प्रभाव से बचे रहना और इन्हे नाराज़ न करना बड़ी चुनौती है.