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बुधवार, 30 अगस्त, 2006 को 09:57 GMT तक के समाचार

जॉन सडवर्थ
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

प्रतिभा पलायन का रुख़ पलटा

पिछली सदी में भारत को प्रतिभा पलायन की समस्या से दो-चार होना पड़ा लेकिन अब बेहतर अवसरों की तलाश में प्रवासी भारतीय अपने वतन की ओर लौट रहे हैं.

फिलहाल विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की संख्या लगभग ढ़ाई करोड़ है.

हाल ही में लंदन छोड़ कर दिल्ली में बसने वाले मनीष के मुताबिक़ शुरुआत में उनके पिता ने इस फ़ैसले का विरोध किया लेकिन बाद में वे खुद भारत की प्रगति से हैरान रह गए.

आज मनीष एक ट्रेवल एजेंसी चलाते हैं और हर रोज उन्हें लगभग 200 बुकिंग मिलती हैं.

मनीष कहते हैं कि भारत में बच्चों के खेलने लिए खुली जगह है और रहने के लिए ढेर सारा सुकून.

वतन वापसी

भारत की मज़बूत होती अर्थव्यवस्था प्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभूमि की ओर आकर्षित कर रही है.

एक आकलन के मुताबिक 35 हज़ार प्रवासी भारतीयों ने हाइटेक शहर बंगलौर को अपना ठिकाना बनाया है.

पिछले कुछ समय में विदेशों में पैदा हुए भारतीय मूल के लोगों के लिए भारत सरकार विशेष आव्रजन व्यवस्था ‘स्पेशल इमिग्रेशन स्टेट्स’ के ज़रिए काफ़ी सहूलियतें दे रही है.

अब प्रवासी भारतीय नागरिकता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके ज़रिये बिना विदेशी पासपोर्ट के भी यहॉं के नागरिकों जैसी ही सुविधाएँ दी जाएँगी.

प्रवासी मंत्रालय में संयुक्त सचिव जी गुरुचरन कहते हैं, “पिछले छः महीनों में हमने 40 हज़ार से ज़्यादा प्रवासी नागरिकता प्रमाणपत्र जारी किए हैं. मेरा मानना है कि आगे यह संख्या और बढ़ेगी.”

करियर

भारत की चिकित्सा प्रणाली अपने सुनहरे दौर में है. जो डॉक्टर विदेशों से प्रशिक्षित होकर आए हैं उनको यहाँ काफी संभावनाएँ नज़र आती हैं

एक निजी अस्पताल के लिए डॉक्टरों की नियुक्ति करने वाली डॉ शबनम सिंह के मुताबिक भारत के निजी क्षेत्र में मेडिकल सुविधा का स्तर पश्चिमी देशों के समतुल्य है बल्कि कुछ मामलों में उससे भी बेहतर है.

भारत सरकार के पास ऐसे आँकड़े नहीं हैं जिससे यह पता चले कि आप्रवासियों की वातन वापसी किस दर से हो रही है.

कई अप्रवासी बिना यहॉं बसे,स्पेशल इमिग्रेशन स्टेट्स के फ़्री वीज़ा के ज़रिये भारत में घूमना और पढ़ना चाहतें हैं.

कई विदेशी कलाकार भी भारत की ओर रुख़ कर रहें हैं. इन्हीं में से एक हैं ब्रिटेन में जन्मी फ़ेरेना स्कॉट जो बॉलीवुड में काफ़ी व्यस्त हैं.

वो कहती हैं “भारत में सबके लिए कुछ न कुछ है. थोड़े से पैसे में आप यहाँ ढ़ेर सारा लुत्फ़ उठा सकतें हैं.”

पर ‘जादुई अर्थव्यस्था’ कहे जाने के बावजूद भारत में ग़रीबी का प्रतिशत चौंकाने वाला है.