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रविवार, 20 अगस्त, 2006 को 23:14 GMT तक के समाचार

अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

दिल्ली में सिनेमा देखने का तजुर्बा

दिल्ली में सिनेमा देखना तजुर्बा है. मेरे लिए तो ज़रूर है. कुछ एक अच्छे सिनेमाघर हैं पर अपेक्षाकृत मंहगे हैं. ऐसे सिनेमाघर जिनके बारे में कुछ लोग कहते हैं यहां ‘अच्छा क्राउड’ आता है.

टिकटों के लिए कतार में नहीं लगना पड़ता, ऑनलाइन बुकिंग हो जाती हैं. पंद्रह मिनट पहले थिएटर पहुँचें, क्रेडिट कार्ड दिखा कर टिकट लीजिए. लेकिन इसके आगे मामला कष्टप्रद है.

क्यों? हॉल में घुसने के लिए लंबी कतार है. बचपन में राशन की दुकान की कतारें याद आती हैं.

भीतर जाने वाले हर व्यक्ति की कस कर तलाशी ली जाती है. पहले मेटल डिटेक्टर के ज़रिए. फिर थिएटर के सिक्यूरिटी गार्डों से. हैंडबैग तक भीतर ले जाने की इजाज़त नहीं.

इतनी कड़ी व्यवस्था हवाई अड्डों पर हो तो चरमपंथी हमला लगभग असंभव हो जाए. यह सब दर्शकों की सुरक्षा के लिए है.

यात्रा करना कई बार अनिवार्य होता है, फ़िल्म देखना नहीं इसलिए यह अनुभव मुझे कष्टप्रद लगता है.

अलग ही नियम

भीतर क़ानून दूसरे हैं. ओंकारा फ़िल्म देख रहा था जो वयस्कों के लिए थी. मगर हॉल में पाँच से पंद्रह साल की उम्र के कम से कम पचास बच्चे तो होंगे ही.

मेरी बगल में बैठे परिवार की दो बच्चियां (जो संभवत: उकता गई थीं) बार-बार बाहर जाना चाहतीं थीं.

सात साल की बच्ची अपनी पाँच साल की बहन की उँगली पकड़ कर उसे बाहर ले जाती है.

खचाखच भरे अंधेरे हॉल में दो सीटों के बीच संकरी जगह से रास्ता निकालती उन बच्चियों को देखना कई लोगों के लिए मनोरंजक था. वो उन्हें रोकते, पूछते कहाँ जाना चाहती हो, क्यों जाना चाहती हो इत्यादि. फ़िल्म एक तरफ़ चलती रहती है.

हालांकि आम तहज़ीब है कि फ़िल्म शुरु होने से पहले लोग अपने मोबाइल फ़ोन बंद कर दें, लेकिन दिल्ली में ऐसा कम ही होता है.

फ़ोन पर लंबी बातचीत चलती रहती है. बगल में बैठे लोगों की शिकायतों से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता.

फ़िल्म के दौरान आने वाले दृश्यों पर अटकलें और फ़िल्म की लगातार समीक्षा बगल में बैठे दोस्तों के साथ ऐसे करना जैसे कॉफ़ी हाउस में बैठ कर बातें हो रही हों, आम बात है.

यह दिल्ली के मँहगे सिनेमाघरों में जाना वाला ‘अच्छा क्राउड’ है जो शायद यही मानता है कि तरक्की का तहज़ीब से कोई वास्ता नहीं.

(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).