गुरुवार, 17 अगस्त, 2006 को 10:07 GMT तक के समाचार
नेपाल में माओवादी विद्रोहियों के नेता प्रचंड ने कहा है कि व तब तक सरकार में शामिल नहीं होंगे जब तक कि देश के संरचनात्मक ढाँचे में बड़े बदलाव नहीं किए जाते.
प्रचंड ने गुरूवार को बीबीसी से कहा कि माओवादी सत्ता में शामिल होने के लिए जल्दबाज़ी में नहीं हैं. हालाँकि उन्होंने इस बारे में कुछ ज़्यादा विवरण नहीं दिया कि वे देश में किस तरह के संरचनात्मक बदलाव चाहते हैं.
माओवादी विद्रोही मौजूदा एसेंबली के बजाय एक अंतरिम संसद के गठन की हिमायत कर रहे हैं. मौजूदा एसेंबली में माओवादियों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.
माओवादी इस पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि मौजूदा राजतंत्र के बदले देश में एक संघीय गणराज्य बनाया जाए.
अप्रैल 2006 में जब अपने सीधे शासन के ख़ात्मे की घोषणा की थी तो माओवादी विद्रोहियों ने भी युद्ध विराम की घोषणा की थी.
जून में माओवादियों और सात दलों वाले राजनीतिक गठबंधन ने सत्ता बँटवारे का एक समझौता किया था.
बड़ा झटका
माओवादी विद्रोहियों के प्रमुख प्रचंड के इस ताज़ा बयान से प्रस्तावित अंतरिम गठबंधन सरकार के गठन पर संदेह पैदा होने लगे हैं.
इस तरह की अनिश्चितता से संविधान सभा के लिए होने वाले चुनावों पर असर पड़ सकता है जो साल 2007 में होने हैं, हालाँकि प्रचंड ने उन चुनावों के लिए अपना सहयोग देने का वादा किया है.
माओवादी विद्रोहियों के निरस्त्रीकरण के बारे में संयुक्त राष्ट्र की योजना पर भी सरकार और माओवादियों में हाल ही में मतभेद हो गए थे.
सरकार और माओवादी देश में राजतंत्र के भविष्य के बारे में एकमत नहीं हैं. प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने मौजूदा संसद के विघटन से इनकार किया है और उन्होंने माओवादी विद्रोहियों को हथियार डाले बिना उन्हें सरकार में शामिल किए जाने से भी इनकार किया है.
सरकार और माओवादी दोनों ही इस बात पर पहले ही सहमत हो चुके हैं कि वे अपने-अपने सैनिक संयुक्त राष्ट्र की निगरानी के तहत पूर्व निर्धारित इलाक़ों में ही रखेंगे.
संयुक्त राष्ट्र की टीम माओवादी विद्रोहियों के हथियारों की योजना की निगरानी के लिए सितंबर में नेपाल पहुँचने वाली है.
लेकिन मुश्किलें अब भी बनी हुई हैं क्योंकि माओवादियों के निरस्त्रीकरण के बारे में बारीकियाँ अब भी तय की जानी हैं.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि संविधान सभा का चुनाव इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दस साल का संघर्ष ख़त्म होने की उम्मीद जताई जा रही है. इस संघर्ष में तेरह हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है.
संविधान सभा ही देश में राजतंत्र के भविष्य के बारे में भी फ़ैसला लेगी. देश में अप्रैल 2006 में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन से राजतंत्र को एक बड़ा झटका लगा है. उस आंदोलन को माओवादी विद्रोहियों का भी समर्थन हासिल था.
इस आंदोलन के बाद ही राजा ज्ञानेंद्र ने अपना सीधा शासन त्याग कर संसद बहाल की थी. उसके बाद से राजतंत्र की बहुत सी शक्तियाँ ख़त्म कर दी गई हैं लेकिन माओवादियों का कहना है कि देश में राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र की स्थापना होनी चाहिए.