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बुधवार, 16 अगस्त, 2006 को 12:31 GMT तक के समाचार

उत्तर प्रदेश में बढ़ता राजनीतिक टकराव

उत्तर प्रदेश सरकार और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के संगठन जनमोर्चा के बीच टकराव गहराता जा रहा है.

दो साल पहले गाजे-बाजे के साथ रिलायंस के अनिल अंबानी और उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक बड़ी परियोजना का शिलान्यास किया था. दो साल में बिजली उत्पादन का वादा किया गया था.

आज बिजली संयंत्र तो दूर इस परियोजना के लिए भूमि के अधिग्रहण पर सवाल उठ रहे हैं. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जनमोर्चा के बैनर तले किसानों की आवाज़ बनकर उभरने की मुहिम में लग गए हैं.

उन्होंने आरोप लगाया है कि इस परियोजना के विरुद्ध आयोजित 17 अगस्त की रैली के पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़े पैमाने पर किसानों की गिरफ़्तारी की है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा,‘‘आज़ादी के दिन उत्तर प्रदेश के किसान के हाथों में हथकड़ी-बेड़ियां डाली गईं. भगवान कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही जेल में पैदा हुए थे जनता वही अवतार लेकर निकलेगी.’’

अब सरकार ने धारा 144 लगा दी है और विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कई नेताओं को आंतरिक सुरक्षा के मद्देनज़र दादरी में घुसने से मना कर दिया गया है जहाँ गुरूवार को रैली का आयोजन किया गया है.

विश्वनाथ प्रताप सिंह का कहना है कि गुरुवार को प्रतिबंध के बावजूद रैली में जाएँगे.

राजनीतिक टकराव

उत्तर प्रदेश सरकार का कहना हैं कि उच्च न्यायालय के क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के आदेश का वह केवल पालन कर रही हैं.

राज्य के मुख्य गृह सचिव सतीश कुमार अग्रवाल ने कहा,‘‘हाइकोर्ट के आदेश में भी कहा गया है कि जहाँ पर रिलायंस का प्लांट लगाने की बात है उस पर कोई रैली प्रदर्शन न करने दिया जाए. ज़मीन पर जो भी प्रोपर्टी हैं और जो भी व्यक्ति वहां काम कर रहे हैं उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.’’

जनमोर्चा के सदस्य राज़ बब्बर का आरोप हैं कि पॉवर प्रोजेक्ट के लिए साढ़े तीन सौ एकड़ भूमि चाहिए. पर उत्तर प्रदेश सरकार ढा़ई हज़ार एकड़ भूमि अधिग्रहित कर चुकी हैं और 1000 एकड़ और भूमि लेना चाहती हैं. वे सवाल उठा रहे हैं कि सरकार इतनी ज़मीन पर क्यों कब्ज़ा चाहती हैं.

राज्य सरकार और जनमोर्चा में ऐसे समय टकराव बढ़ रहा है जबकि राज्य में चुनाव होने वाले हैं और किसान जैसे महत्वपूर्ण वोट बैंक पर सबकी नज़र है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि मुलायम सिंह के लिए किसान विरोधी छवि भारी पड़ सकती है.