बुधवार, 16 अगस्त, 2006 को 13:57 GMT तक के समाचार
वर्ष 2001 में तालेबान का तख़्तापलट हुआ – ईरान और पाकिस्तान में रह रहे हज़ारों अफ़ग़ान शरणार्थी ये सोचकर लौटे कि अब उनका देश वापिस सामान्य हो सकेगा.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में हालात आज भी ख़राब हैं, ख़ासकर उन इलाक़ों में जहाँ तालेबान फिर ताकतवर बनकर उभरे हैं.
दो हफ़्ते पहले में दक्षिणी प्रांत कंधार में एक आत्मघाती हमले में 21 लोगों की मौत हो गई थी और ऐसे हमले लगातार होते रहे हैं.
पाकिस्तान में शरणार्थी के तौर पर रह रहे इज़्ज़तुल्लाह दो साल पहले अफ़ग़ानिस्तान लौटे लेकिन कहते हैं कि वो अपनी जिंदगी बमों और संगीनों के साए में जी रहे हैं.
इज़्ज़तुल्लाह कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान के हालात बहुत ख़राब हैं. तालेबान और सेना के बीच लड़ाई होती है और साथ में धमाके भी होते रहते हैं."
इज़्ज़तुल्लाह की बहन फ़रीदा कहती हैं कि तालेबान को अफ़ग़ानिस्तान से हमेशा-हमेशा के लिए चले जाना चाहिए और हम अपने मुल्क में लड़ाई नहीं चाहते हैं.
तालेबान का मुक़ाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सेना पहुँची है, लेकिन लोगों का कहना है कि इससे तालेबान की ताक़त पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा है.
"मेरे ख़याल से नाटो और गठबंधन सेनाएँ इसे रोक नहीं सकते हैं और दिन ब दिन उन लोगों का असर बढ़ता जा रहा है."
लड़ाई जारी है
इस बीच, रुक-रुक कर लड़ाई जारी है. अगस्त में अब तक 170 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं – इनमें 21 अफ़ग़ानिस्तान पुलिस के लोग हैं, 11 नैटो सैनिक और 117 संदिग्ध तालेबान, लेकिन कम से कम 21 आम नागरिक भी मारे गए हैं.
कई लोग तालेबान को लगातार जारी हिंसा के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं, लेकिन लोग ऐसे भी हैं जो अंतरराष्ट्रीय सेना को भी एक ऐसी विदेशी ताक]त के रूप में देखते हैं जो अफ़ग़ानिस्तान पर क]ब्ज़ा करके बैठी है.
ऐसे लोगों का कहना है कि विदेशी गठबंधन सेना और विदेशी ताक़तें अफ़ग़ानिस्तान को छोड़कर जाना भी नहीं चाहते -
ऐसा लगता है कि विदेशी गठबंधन सेनाएँ इस देश में ख़ुद तालेबान को रोज़ ब रोज़ ज़्यादा ताक़त देना चाहते हैं ताकि इस मुल्क में और अशांति हो जाए और विदेशी गठबंधन सेनाओं के लिए ऐसे मौक़े पैदा हो जाएँ जिससे वो अफ़ग़ानिस्तान में ख़ुद को और मज़बूत कर सके.
विदेशी गठबंधन सेना का नेतृत्व कर रहे नैटो कमांडर कहते हैं कि वे तालेबान को हरा सकते हैं लेकिन उसमें समय लगेगा.
इन कमांडरों का कहना है कि तालेबान के हमलों के कारण वहाँ पुनर्निर्माण का काम रुक रहा है.
दूसरी ओर तालेबान का कहना है कि वे ये युद्ध जीतकर ही दम लेंगे, और इन दोनों सामरिक शक्तियों के पाटों के बीच पिस रहे हैं अफ़ग़ानिस्तान के लोग...