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रविवार, 13 अगस्त, 2006 को 15:49 GMT तक के समाचार

रेणू अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

ठंडे पर 'गरमा-गरम' चोट

पूरे हफ़्ते कोका कोला की बोतल में तूफ़ान आता रहा. कंपनी के मालिक पसीना पोछते नज़र आए. आख़िर 7000 करोड़ रुपए के धंधे पर 25 लाख रुपए में ख़रीदी गई एक मशीन ने ग्रहण जो लगा दिया था.

आप समझे नहीं? विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने जब तीन साल पहले कोल्ड ड्रिंक्स में कीटनाशकों की ख़बर से सनसनी फैला दी थी तब कोला कंपनियों ने सीएसई के परीक्षण पर संदेह का जाल फेंका था.

उनके लिए ये एक अस्त्र था सुनीता नारायण और उनके साथियों को चुप कराने के लिए. अबकी बार छोटी सी दिखने वाली पर गज़ब की हिम्मत वाली सुनीता नारायण पूरी तरह लैस थी.

उन्होंने 25 लाख की मशीन लगाई ताकि कोला कंपनियाँ हिचकी भी न ले पाएँ. अब हालत ये है कि कोला पर प्रतिबंध लगाने की नेताओं में होड़ लग गई है. वहीं उद्योग जगत में हड़कंप है.

हालत ये है कि मैं एक बच्चे के जन्मदिन पर गई तो पाया कि ऐसी पार्टियों का सबसे ज़रूरी आइटम कोला नदारद था और बच्चों के मुँह लटके हुए थे. उनकी शिकायत थी कि केक तो मिली, चिप्स भी मिले पर जब तक ठंडा मतलब... न हो तो ये दिल कैसे माने.

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फिर 'तेरी' कहानी याद आई

पंजाब में कुएँ में मिले कन्या भ्रूणों की ख़बर ने झकझोर कर रख दिया और बरबस ईरान की याद आ गई.

पंजाब की इस दर्दनाक घटना और ईरान में कैसा संबंध? चलिए बताती हूँ. जब पिछले साल भारत से कुछ पत्रकार ईरान के दौरे पर गए थे तो ईरान की महिला पत्रकारों से उनकी मुलाक़ात हुई. वहाँ मैं भी थी.

हमने बहुत ही गर्व से उन्हें बताया कि हमारे देश में कितनी आज़ादी है. जो मन में आए हम पहन सकते हैं, जिससे मिलना चाहे मिल सकते हैं और जो नौकरी करना चाहे कर सकते हैं.

यानी हमने ये बताने की कोशिश की कि भारत में महिलाओं की दशा उनके देश से कहीं बेहतर है. ये सब सुनकर वहाँ बैठी एक महिला ने अपने सवालों की तरकश से एक तीर छोड़ा.

उन्होंने पूछा, क्या भारत में दहेज नहीं माँगा जाता और क्या वहाँ कन्या भ्रूण हत्याएँ नहीं होती? हमने जवाब तो दिया पर ये सवाल हमेशा के लिए दिल को झकझोर गया और फिर पंजाब की घटना ने इसकी याद दिला दी.

यानी सौ बात की एक बात आप 21वीं सदी के भारत की कोई भी तस्वीर पेश करें एक सच्चाई ये भी है कि कुछ चीज़ें आज भी हमें शर्मसार करती है.

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हम तो डूबेंगे सनम लेकिन...

भारत की चर्चा में राजनीति की चर्चा न हो ऐसा हो नहीं सकता. वो भी ऐसे समय जब लोकसभा से विपक्षी एनडीए नदारद हो और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी इस्तीफ़े की धमकी दे रहे हों.

जब वाजपेयी गर्माए और नटवर सिंह ग़ुस्साए. राजीनीति में ड्रामे की कभी कोई कमी नहीं रही. नज़ारा देखने को भी मिल ही गया.

नटवर सिंह ने सोनिया के त्याग को याद किया पर साथ ही कहा कि उनके बिना कांग्रेस में एक पत्ता भी नहीं हिलता.

तो इराक़ में क्या हो रहा था उन्हें तो पता ही था. फिर मँझे हुए खिलाड़ी की तरह उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह कि वे इज़्ज़त करते हैं पर देश को ज़रूरत है एक सशक्त नेतृत्व की.

शायद नटवर ने मन बना लिया है कि 'हम तो डूबेंगे सनम, पर आपके बिना नहीं.' इस सब के बीच पुत्र जगत सिंह का तनाव बढ़ रहा रहा वे अपनी राजनीति की दुकान अब कहाँ चलाएंगे?

(आपको ये कॉलम कैसा लगा. आप अपने विचार hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं.)