शनिवार, 12 अगस्त, 2006 को 18:41 GMT तक के समाचार
मणिकांत ठाकुर
बीबीसी संवाददाता, पटना
आज़ादी के 60 वें जश्न पर सवाल बन कर भारी है एक 80 साल का बूढ़ा आदमी.
रहते हैं बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में. नाम है अब्दुल गफ़्फ़ार. न कोई अपनी ज़मीन और न कोई अपना मकान.
पहले रिक्शा चलाते थे. अब अपनी कुल 50 रुपए की जमा-पूंजी लगाकर गांधी मैदान के फ़ुटपाथ पर खैनी, बीड़ी, साबुन, माचिस, गुटखा वग़ैरह बेचते है.
गुज़ारे लायक आमदनी तो होती नहीं, फिर भी ज़िद है कि वो किसी भी सूरत में भीख नहीं माँगेंगे.
बीवी 30 वर्ष पहले मर गई. दो साल पहले 800 रूपए में रिक्शा बेचकर बेटे को दिल्ली भेजा था रोज़ी-रोटी कमाने. वह भूल गया इस बूढ़े बाप को. बाक़ी रिश्तेदारों ने भी ठोकर मार दी.
अब यही गांधी मैदान उनका बसेरा है. बारिश और धूप से बचते-छिपते, सोते-जागते कट रही है ज़िंदगी. पहले दानापुर में सपरिवार एक कहार के घर में रहते थे. फिर बाकरगंज में कुछ समय तक आसरा मिला. अब एक-अकेला रह गया तो फ़ुटपाथ ज़िंदाबाद.
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अपनों का सिला
80 बरस की ज़िंदगी के दौरान बने-बिगड़े संबंधों को याद करते हुए गफ़्फ़ार बताते हैं, "मेरा कोई नहीं है. सबने मेरे साथ गद्दारी की. बेटा दिल्ली गया पर आज तक एक ख़त भी नहीं लिखा और न जानने की कोशिश की कि बाप ज़िंदा भी है या मर गया."
गफ़्फ़ार की सूनी आँखों को देखकर इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनके साथ गद्दारी केवल अपनों ने ही नहीं, इस देश के उन तमाम महकमों ने भी की है जिनके बारे में वे आज़ादी के वक्त सोचा करते थे कि वे उनकी और देश की सूरत बदलेंगे.
इस गद्दारी का ज़िक्र करते-करते गफ़्फ़ार का गला भर आता है और आँसू छलक कर बाहर आ जाते हैं.
उम्र के इस पड़ाव पर जर्जर हो चुके शरीर में भी काम करते रहने का हौसला भरते हुए यह बूढ़ा आदमी एक दर्द भरी टीस को दबा लेता है.
हाल ही में एक तेज़ रफ़्तार मोटरगाड़ी ने उन्हें धक्का मार दिया था. एक बाँह की हड्डी टूट गई थी. अस्पताल गए तो थे लेकिन बिना इलाज कराए वापस लौट आए.
डॉक्टरों ने दवा-मरहम-पट्टी वग़ैरह पर कुल 450 रुपए का ख़र्च बताया था. कहाँ से लाते इतने रुपए इसलिए अपनी गर्दन से गमछा बाँधकर उन्होंने लटका दिया है अपने टूटे हाथ को. दर्द सहते रहने की आदत जो है उन्हें.
'इंकलाब ज़िंदाबाद'
गफ़्फ़ार आज़ादी के संघर्ष को याद करते हैं. वो बताते हैं कि गांधी जी अक्सर यहाँ आया करते थे. वो ख़ुद भी कई बार इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा बुलंद करते हुए जुलूसों में शामिल हुए हैं.
इस 'ज़िंदाबाद' शब्द की 60 साल पुरानी गूँज उनकी स्मृति में अब भी शेष है. याद है वो दिन, जब अंग्रेज़ों को यहाँ से भगाकर मिली आज़ादी के उछाह में तिरंगा लिए उछलते-कूदते जुलूस में वह भी शामिल हुए थे.
पर अब 'हासिल क्या रहा?' जैसी कोई शिकायत भी नहीं है उन्हें. सब तक़दीर का दोष मान लिया है.
गांधी मैदान से बिल्कुल सटा हुआ पटना के ज़िलाधीश का आवास और दफ़्तर लेकिन वहाँ कभी घुसने नहीं दिया गया इस बूढ़े को.
ग़रीबी रेखा से नीचे वालों की सूची में नाम लिखवाने या इमदादी (राशन) कार्ड बनवाने की तमाम कोशिशें कीं. कई बार फ़ोटो के साथ अर्ज़ियाँ लगवाईं पर सब बेकार. कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई.
ग़रीबों को 'इंदिरा आवास' दिए जाने का सरकारी ढिंढोरा अक्सर चुभता रहा है उनके कानों में.
लेकिन इसी गांधी मैदान में मंगलवार (15 अगस्त) को 60वाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाने के लिए सज रहे सलामी मंच और परेड ग्राउंड की तरफ उठती उनकी बूढ़ी आंखों में एक चमक आज भी साफ़ दिख रही थी.
'किसको आती है मसीहाई...'
इसी गांधी मैदान में कितनी ही जनसभाएँ होती हैं, कितने ही वादे होते हैं और कितनी ही रैलियाँ होती हैं. व्यवस्था में सुधार लाने के लिए. पर गफ़्फ़ार की ज़िंदगी इस मैदान पर होते हुए भी इन वादों, सुधारों से वंचित है.
कुछ देना तो दूर कभी किसी ने यह भी नहीं पूछा कि किस तरह वो अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को खींच रहे हैं.
इस बूढ़े आदमी के साथ बातचीत करते समय गांधी मैदान में उत्सुकतावश जमा हुई एक छोटी सी भीड़ के तमाम लोग भावावेश में आ गए थे.
एक ने कहा, "इनकी आँखों में आँसू लाने वाले जब उस मंच पर तिरंगा फहराएँगे तब आप मीडिया वाले उन्हीं की जयजयकार दिखाइएगा और सुनाइएगा." दूसरे युवक ने रोषभरा कटाक्ष किया, "मैं तो 15 अगस्त के दिन नेताओं को चुन-चुनकर 15 गालियाँ देता हूँ."
यह सब सुनकर कुछ सोच में पड़ गया था यह बूढ़ा आदमी.
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