बुधवार, 09 अगस्त, 2006 को 19:30 GMT तक के समाचार
मोनिका चड्ढा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
मुंबई में 1993 में हुए बम धमाकों के 13 साल बीत चुके हैं लेकिन इसे याद कर आज भी यहाँ कई लोगों की आँखें भर आती हैं और चेहरे पे दर्द के निशां उभर आते हैं.
विनायक देवरुखर की बड़ी बहन और छोटा भाई उन 12 धमाकों में मारे गए थे जिसने मुंबई को हिला कर रख दिया था.
उन्हें याद कर विनायक की आँखें भर आती हैं.
वो कहते हैं,'' मैं 14 साल का था. बड़ी बहन शशिकला 19 की और छोटा भाई 11 साल का था. शशिकला और छोटा भाई स्कूल की बस पकड़ने बस स्टॉप पर खड़े थे जब वरली के सेंचुरी बाज़ार में बम फटा.'
12 मार्च, 1993 को मुंबई में सिलसिलेवार 13 बम धमाके हुए जिसमें 257 से लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हुए.
सेंचुरी बाज़ार के धमाकों में सबसे अधिक मौतें हुई थीं. कुल 113 बस स्टॉप, मार्केट, ऑफिस, इमारतों सभी जगह बम फटे.
विनायक को वो दिन अब भी याद है. वो बताते हैं,'' मैं अपनी दुकान पर था. मुझे याद है धमाका बहुत ज़बर्दस्त था. इतना तेज़ की दुकानों के शीशे टूट गए. हवा काली हो गई. धुआं ही धुआं था. मेरी माँ दौड़ती हुई आई और बोली की भाई बहन बाहर हैं उन्हें खोजो.''
विनायक की आंखे भर जाती हैं. वो बताते हैं, " सड़क पर चारों ओर लोग पड़े हुए थे. लोगों के शरीर के अंग बिखरे पड़े थे. मैं स्कूल तक गया. वे वहां नहीं थे. भीड़ में भी वे नहीं दिखे. मैं वापस लौटा और इंतज़ार करने लगा."
विनायक का ये इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं हो सका. दोनों भाई बहनों की जली लाशें अस्पताल में मिलीं.
विनायक के अनुसार लाशें देखने के बाद उनके माता पिता जहां सदमे में थे वहीं दो और बहनें कुछ समय के लिए मानसिक रुप से असंतुलित हो गई थीं.
इस घटना के बाद विनायक ने पढ़ाई छोड़ दी. अब वो एक फोन बूथ चलाते हैं और पार्ट टाइम काम करते हैं. परिवार को सरकार से चार लाख रुपए का मुआवज़ा मिला लेकिन न्याय का अब भी इंतज़ार है.
विनायक के पिता 75 वर्षीय चंद्रकांत देवरुखर को न्यायालय में चल रहे मामले में रुचि नहीं है जो 13 साल से विशेष अदालत में चल रहा है.
वो कहते हैं, "मेरे दो बच्चे चले गए. धमाके करने वालों ने किसी दुश्मन के बारे में नहीं सोचा. वे तो बस अधिक से अधिक नुक़सान पहुँचाना चाहते थे. सरकार को भी अधिक से अधिक सज़ा देनी चाहिए."
ज़ख़्म ताज़ा
बेबी गोपीनाथ गोंधाली का 13 वर्षीय पुत्र भी वरली धमाकों की भेंट चढ़ा था.
अपने बेटे को याद करते हुए बेबी गोपीनाथ की आंखों में अब भी एक चमक दौड़ जाती है. वो कहती है, ''उसका नाम प्रशांत था. चुप-चुप रहता था. बहुत पढ़ता था. कभी बाहर के बच्चों के साथ नहीं खेलता था. अधिकतर घर में रहता और पढ़ता.''
धमाके वाले दिन प्रशांत स्कूल नहीं गया था. लेकिन बस स्टॉप के पास कुछ ख़रीद कर खा रहा था तभी धमाका हुआ. धमाके से टूटे दुकानों का एक शीशा प्रशांत की छाती में आ लगा. वह दौड़ कर घर वापस आया और डर से पलंग के नीचे छुप गया.
बेबी बताती हैं कि धमाके के कारण अफरातफरी थी. किसी का ध्यान प्रशांत की ओर नहीं था क्योंकि सभी लोग घटनास्थल की ओर चले गए थे. बाद में बेबी ने प्रशांत की छाती से बहता खून देखा लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.
प्रशांत का बहुत खून बह चुका था. उसे बचाया नहीं जा सका.
बेबी को दो लाख रुपए का मुआवज़ा मिला जिससे उन्होंने घर बनाया. पुराना घर धमाकों में बिखर गया था.
झुग्गियों में रहने वाले इन लोगों को न्यायालय में चल रहे मामले की जटिलताओं का पता नहीं है और न ही वे इनकी ख़बर रखते हैं लेकिन चाहते हैं कि दोषियों को कड़ी सज़ा मिले.