सोमवार, 07 अगस्त, 2006 को 15:57 GMT तक के समाचार
नेपाली माओवादी नेता बाबूराम भट्टाराई का कहना है कि नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने के प्रति वर्तमान सरकार की नीयत साफ़ नहीं लग रही है और अगर ऐसा होता है तो शांति वार्ताएँ अधर में जा सकती हैं.
उन्होंने कहा कि अगर समय रहते सरकार जन भावनाओं को नहीं समझती है तो नेपाल में दूसरे और तीसरे जन आंदोलन का बिगुल फूँका जा सकता है.
पिछले दिनों बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल ने बाबूराम से कई मुद्दों पर बातचीत की.
आइए पढ़ते हैं इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-
क्या नेपाल में चल रही शांति वार्ताएँ ख़तरे में पड़ सकती हैं?
जिस हिसाब से शांति वार्ता आगे बढ़नी चाहिए थी उस तरह से हो नहीं रहा है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की जो टीम आई थी वो एक तरह के नतीजे पर पहुँची थी और संयुक्त रूप से एक पत्र देने की कोशिश की थी. इसे हमने मंज़ूर करके भेज भी दिया था.
अब चार दिन हो गए हैं. कोइराला साहब ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए हमें लग रहा है कि वे इसे टाल रहे हैं या किसी का उनके ऊपर बहुत ज़बरदस्त दवाब है. हमने कहा है कि या तो यह बता दिया जाए कि कैसा दवाब है या फिर यह कह दें कि हमने आपका साथ छोड़ दिया है और हम राजा के साथ जा रहे हैं. नहीं तो क्या दबाव, क्या मजबूरी है बताइए.
आपको क्या लगता है. इस सरकार पर क्या दवाब या किस तरह की मजबूरी हो सकती है?
सरकार यह भूल रही है कि जो आंदोलन हमने किया था उसमें आम लोग, हम और सात राजनीतिक दल, यह तीन मुख्य ताकतें थीं. इन तीनों की वजह से ही वो सत्ता में पहुँचे. वो यह भूल रहे हैं. वो सोच रहे हैं कि उनको संसद और कुर्सी मिल गई है और वो अब वहीं रहेंगे. उन्हें ऐसा लग रहा है इसलिए इनके ऊपर दवाब बनाना पड़ेगा.
आम लोगों ने भी आंदोलन शुरू किया है. हमने भी कहा है कि अगर वर्तमान व्यवस्था हमारे ख़िलाफ़ जाती हैं, राजा के पक्ष में जाती है तो हमें दूसरा या तीसरा जन-आंदोलन करना पड़ेगा.
आपने इशारा किया है कि किसी दबाव में कोइराला काम कर रहे हैं? क्या कुर्सी पर बने रहने का दबाव है या किसी बाहरी ताक़त का दबाव है?
हमें ऐसा लग रहा है कि कुछ न कुछ दबाव हैं. उनके पार्टी में भी कुछ ऐसे लोग है जो राजमहल के नज़दीकी हैं और कुछ बाहरी ताकतों के भी नज़दीक हैं. वे चाहते हैं कि माओवादी किसी भी तरह से आगे न आ पाएँ. सत्ता में न जा पाए. जो राजशाही है उसको भी कायम रखा जाए.
आप सरकार को समर्थन दे रहे हैं. सात मुद्दों पर आपकी सहमति है तो क्या ये टूटने की कगार है?
हमने कोई समर्थन नहीं दिया है. सरकार को हमारा समर्थन है ऐसा कहना ग़लत बात है क्योंकि आंदोलन में जिन्होंने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया था उसके बाद संयुक्त अंतरिम सरकार बननी चाहिए थी. उसी की लिए बात चल रही है. ये सोच रहे हैं कि अंतरिम सरकार न बनाएँ और इसी सरकार को आगे बढाएँ. ऐसा करना जनआंदोलन की भावना के ख़िलाफ़ है.
माओवादियों की ओर से शस्त्र त्यागने की बात हुई थी. उस दिशा में आप लोग क्या कदम उठा रहे हैं?
हमने ऐसा कभी नहीं कहा. शस्त्र तो राजा के निजी सेना ने लोकतंत्र के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया है. वो राजशाही का अब भी समर्थन करते हैं. शस्त्र तो उन्हें त्यागना चाहिए. जनता की माँग है कि जो राजा की सेना है उसे शस्त्र त्यागना चाहिए. नई नेशनल आर्मी बनानी चाहिए जिसमें हमारी सशस्त्र वाहिनियाँ भी शामिल हों.
संयुक्त राष्ट्र की टीम आई थी. उनसे आपने क्या कहा?
दूसरे देशों का जो मॉडल है वह यहाँ मेल नहीं खाता. नेपाल की अलग स्थिति है. अगर ये शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं तो जब तक संविधान सभा का चुनाव नहीं होता तब तक के लिए उनकी सेना भी बैरक में रहे, हमारी जो सशस्त्र वाहिनियाँ हैं उसे हम शिविरों तक ही रखेंगे. चुनाव के बाद फिर निर्णय करके नई सेना बनाएंगे, ऐसा हमने उनको कहा है.