शनिवार, 05 अगस्त, 2006 को 16:59 GMT तक के समाचार
झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर एक बंद पड़ी कोयला खदान में पानी भर जाने के तीन दिन के बाद भी कई लोग खदान के अंदर फँसे हुए हैं.
स्थानीय पत्रकार सलमान रावी के अनुसार पिछले तीन दिन तो किसी तरह का बचाव कार्य नहीं हुआ लेकिन अब पश्चिम बंगाल का प्रशासन कुछ हरकत में आया है और बचाव के लिए कुछ गतिविधियाँ शुरु हुई हैं.
लेकिन जल स्तर काफ़ी ऊँचा है, कई दिन से मूसलाधार बारिश हो रही है और खदान का नक्शा उपलब्ध न होने के कारण गोताखोर भी अंदर जा नहीं पा रहे हैं.
बीबीसी के केंद्रीय कोयला मंत्री शिबू सोरेन से संपर्क करने पर कहा था, "खदान बंद पड़ी थी. कोयला माफ़िया मज़दूरों की सहायता से ये कोयले की चोरी करते हैं. हम इसे रोकने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं."
शिबू सोरेन ने घटनास्थल का दौरा किया और आसपास के गाँवों के लोगों से बात भी की.
आसपास के गाँवों का दौरा करने के बाद घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार सलमान रावी ने बीबीसी को बताया कि स्थानीय लोगों का मानना है कि लगभग सौ लोग खदान में फँसे हो सकते हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने औपचारिक तौर पर इनकी संख्या के बारे में कुछ नहीं कहा है.
कई मुश्किलें
पुरुलिया और बर्दवान के बीच स्थित इस खदान में खनन का काम 1970 में ही बंद हो गया था.
बीबीसी संवाददाता सुबीर भौमिक के अनुसार ऐसी लगभग 150 खदानें हैं और ऐसी खदानों में स्थानीय अधिकारियों की मिली-भगत से अवैध खन्न होता है.
पूरे इलाक़े में कई दिन से बारिश हो रही है. ये खदान जहाँ स्थित है वहाँ तीन नदियाँ मिलती हैं और वहाँ तक पहुँचने से पहले एक बाँध भी बनाया गया है.
जल स्तर बढ़ने के कारण, बाँध से पानी छोड़ा गया था जो खदान में भर गया और बारिश से स्थिति और बिगड़ गई है.
सुबीर भौमिक के अनुसार पश्चिम बंगाल प्रशासन इस मामले पर अजीब सी चुप्पी साधे है.
परेशान परिवार
झारखंड के एक गाँव से तो दस लोगों के लापता होने की ख़बर आ ही चुकी है लेकिन पश्चिम बंगाल के भी कुछ गाँव के लोग खदान में फँसे अपने परिजनों के लिए परेशान हैं.
वहाँ कुछ लोगों के परिजनों का कहना था की ग़रीबी के कारण वे उस खदान में अवैध खन्न का काम करते थे.
उन्होंने प्रसासन पर लिपापोती करने का आरोप लगाया.
कुछ लोगों का कहना था कि जहाँ हरियाणा में कुएँ में गिरे एक बच्चे को बचाने के लिए सेना और पूरा प्रसासन जमा हो गया था, वहीं पश्चिम बंगाल फँसे लोगों को बचाने की कोई कोशिश नहीं की गई.
आसपास के गाँववासियों का कहना था कि खदान में एक ऊँची जगह है जहाँ जाकर इतने जल स्तर के बावजूद जान बचाने की संभावना हो सकती है.
प्रभावित परिवार इसी उम्मीद के सहारे बैठे हैं कि शायद इतने दिन के बाद भी उनके परिजन बच ही गए हों.