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संजीव श्रीवास्तव
भारत संपादक, बीबीसी हिंदी

अकेले पड़ गए हैं जसवंत सिंह

राज्यसभा में विपक्ष के नेता और वाजपेयी मंत्रिमंडल में रक्षा, वित्त और विदेश मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाल चुके जसवंत सिंह इन दिनों स्वयं को अकेला और घिरा हुआ पा रहे हैं.

उनकी हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘ए कॉल टू ऑनर’ में उन्होंने प्रधानमंत्री नरसिंह राव के कार्यकाल में जिस जासूस या भेदिए का ज़िक्र कर खासा बवंडर खड़ा कर दिया था अब उसी मुद्दे पर वह स्वयं को फंसा हुआ पा रहे हैं.

कांग्रेस की तमाम चुनौतियों के बाद वह भेदिए का नाम नहीं बता पा रहे और बुधवार को राज्यसभा में भारी शोरगुल के बीच कांग्रेस सांसद नारायणस्वामी ने उनके ख़िलाफ़ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस दिया है.

बुधवार देर शाम तक राज्यसभा सचिवालय में जसवंत सिंह के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस को लेकर खासी हलचल थी.

नोटिस पर बुधवार को फ़ैसला नहीं हुआ पर राज्यसभा के महासचिव योगेंद्र नारायण, सभापति और उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के निर्देश पर इस मामले पर क़ानूनी और संवैधानिक सलाह ले रहे थे.

लेकिन प्रेक्षकों की नज़र से आज का बड़ा सवाल या मुद्दा यह नहीं है कि इस नोटिस को शेखावत स्वीकार करते हैं या अस्वीकार.

गले की हड्डी

राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय जसवंत सिंह की दयनीय सी बन गई स्थिति है. भेदिए या जासूस का मामला जैसे उनके गले में हड्डी की तरह फंस गया है.

हालत यह हो गई है कि राजनीतिज्ञ की तरह से कुछ फिसड्डी ही समझे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इस विषय पर मंगलवार को संसद में गर्जनें और विपक्ष खासकर भारतीय जनता पार्टी को नीचा दिखाने और सार्वजनिक चुनौती देने का मौक़ा मिल गया.

जसवंत सिंह को अपने साथियों से किसी तरह का समर्थन नहीं मिल रहा.

हमने अरूण जेटली, रविशंकर प्रसाद यहाँ तक कि भाजपा के क़रीब समझे जाने वाले मनोनीत सांसद और पत्रकार चंदन मित्रा से भी जब इस विषय पर बात करनी चाही तो सबने जैसे जसवंत सिंह के बचाव से पल्ला झाड़ते हुए इस मामले में नहीं पड़ने की बात कही.

भाजपा के हलकों में यह भी चर्चा है कि मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज तो इस मुद्दे पर जसवंत सिंह के सदन के नेता पद से रवानगी के पक्ष में हैं और स्वयं को उस पद के दावेदार की तरह देखते हैं.

बात सिर्फ़ भाजपा की आंतरिक राजनीति की नहीं है. एक ऐसे समय जब विपक्ष सरकार को मुंबई बम विस्फोट, अमरीका के साथ परमाणु करार और महंगाई जैसे मुद्दों पर घेर सकता था, उस मौक़े पर जसवंत सिंह की पुस्तक और भेदिए के मामले ने उल्टा सरकार को आक्रामक मुद्रा अपनाने का मौक़ा दे दिया है.

देखना अब यह है कि जसवंत सिंह अपने ही बुने हुए इस चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकलते हैं. क्योंकि जब तक यह मामला संसद में नहीं निबटता, लगता नहीं कि विपक्ष सरकार को किसी भी मुद्दे पर कटघरे में खड़ा कर पाएगी.