रविवार, 30 जुलाई, 2006 को 01:18 GMT तक के समाचार
अतुल संगर
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में विभन्न जगहों में उपलब्ध जीव संपदा पर एक अभूतपूर्व ‘डिजिटल लाइब्रेरी’ तैयार की गई है. यदि आप चाहें तो इंटरनेट पर वेब पोर्टल http://www.ibin.co.in/ पर जाकर इस जानकारी का लाभ उठा सकते हैं.
भारत सरकार के जैव प्रौद्यौगिकी और अंतरिक्ष विभागों ने संयुक्त तौर पर भारत की जीव विविधता पर ये जानकारी एकत्र की है.
पहले चरण में पूर्वोत्तर हिमालय, पश्चिमी हिमालय, पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र और एंडमान व निकोबार द्वीप समूह पर पाए जाने वाली वनस्पतियों, जन्तुओं और जीवाणुओं के बारे में जानकारी एकत्र की गई है.
पहले चरण के बाद लगभग 5000 वनस्पतियों की प्रजातियों और उनकी वर्तमान स्थिति के बारे में पता लगाया जा सकता है.
दूसरे चरण में पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र और मध्य भारत की जीव संपदा पर जानकारी जुटाई जाएगी.
वेब पोर्टल http://www.ibin.co.in/ पर विभिन्न क्षेत्रों की जीव संपदा के बारे में विभिन्न भाषाओं में, अलग-अलग तरह की जानकारी पढ़ी जा सकती है और चित्र भी देखे जा सकते हैं.
ये पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में उपलब्ध जैव संपदा और उसके इस्तेमाल से जिन परंपरागत पद्धतियों का खान-पान या फिर चिकित्सा के लिए सदियों से इस्तेमाल किया जाता रहा है, उन पर विदेशों में पेटेंट लेना अब एक आम बात हो गई है.
वर्ष 1996 में एक अमरीकी कंपनी ने हल्दी को घाव भरने की एक अचूक दवा कह कर पेटेंट कराने की कोशिश की थी और एक अमरीका कंपनी की बासमती चावल को पेटेंट करने की कोशिश तो चर्चा में रही ही है.
भारतीय परंपरागत पद्धतियों को पेटेंट करवाना तो अपनी जगह महत्वपूर्ण है ही लेकिन जैव संपदा के बारे विस्तृत जानकारी उपलब्ध होने के बाद, विदेशियों की इन कोशिशों से बचना आसान हो जाएगा.
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न्यायालय में 'शिफ़्ट' व्यवस्था?
किसी भी देश की न्याय व्यवस्था में यदि लाखों मामले लंबे समय तक अटके रहें और न्याय मिलने में सालों-साल लगें तो चिंता स्वभाविक है.
वर्ष 1996 में प्रियदर्शिनी मट्टू की हत्या के बाद 1999 में निचली अदालत ने फ़ैसला सुनाया. हाल में जनता के प्रदर्शनों और मीडिया के दबाव के बाद सीबीआई ने इस मामले में अपनी अपील की जल्द सुनवाई के लिए, उच्च न्यायालय में अर्ज़ी दी, जो स्वीकार भी हुई.
लेकिन ऐसे हज़ारों अन्य लोग हैं जो वर्षों से न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं.
कुछ दिन पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल ने न्यायालयों में 'डबल शिफ़्ट' शुरु करने और सेवा-निवृत्त जजों और अधिकारियों की सेवा का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया.
उनका कहना था कि इससे मौजूदा ढ़ाँचे में ही, लंबे समय से चले आ रहे मामलों का निपटारा हो सकता है.
उनके इस बयान के बाद जनता को आशा की किरण नज़र आई.
सुझाव नया नहीं है. क़ानून आयोग 1988 में अपनी 125वीं रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में ये सिफ़ारिश कर चुका है. वर्ष 1999 में इस व्यवस्था पर सरकार ने विचार भी किया था.
अब श्रीनगर में मुख्य न्यायधीश ने कहा कि वकील 'शिफ़्ट व्यवस्था' के ख़िलाफ़ हैं. लेकिन उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि वे एक बार फिर वकीलों से अपील करेंगे की वे इस विचार का समर्थन करें.
अब वकीलों से ज़्यादा तो कोई नहीं जानता कि कितने मामले, कितने वर्षों से अदालतों में पड़े हैं और कितने लोग न्याय पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. क्या उन्हें इस पीड़ित जनता पर तरस आएगा?
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जनसंपर्क अधिकारियों की परेशानी
वर्षों से सरकार के मंत्री और विभागों के सचिव मीडिया के साथ संपर्क के लिए सूचना और जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों पर निर्भर होते थे.
उनका मानना ये था कि सूचना और जनसंपर्क अधिकारी मीडिया को बेहतर समझते हैं और पत्रकारों के बारे में ज़्यादा जानते हैं, यानि अपने क्षेत्र के माहिर हैं.
लेकिन अब नहीं! जनसंपर्क विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारी आजकल कुछ मंत्रियों और सचिवों से इसलिए परेशान हैं क्योंकि वे उन्हें कोई महत्व ही नहीं देते.
एक परेशान अधिकारी का कहना था,"मंत्री जी का कुछ पत्रकारों के साथ सीधा संपर्क हैं और आम-ख़ास, सब जानकारी उन तक सीधे ही पहुँच जाती है. हम तक तो जानकारी पहुँच भी नहीं पाती. सारा दिन कविताएँ लिखने और लेख पढ़ने में ही ग़ुजरता है..."
कई जनसंपर्क अधिकारियों का ये भी मानना है कि शायद मंत्री और वरिष्ठ सचिव ये मानते हैं कि उनका 'इमेज' पत्रकारों के साथ सीधे संपर्क से ज़्यादा चमकेगा.
इनकी परेशानी तो अपनी जगह है लेकिन उन राज्यों के जनसंपर्क अधिकारियों का क्या हाल होगा जहाँ सरकार ने अपनी 'इमेज मेनेजमेंट' का पूरा काम ही निजी क्षेत्र की कंपनियों के सुपुर्द कर दिया है? जैसे कि हरियाणा!
(हमारी साप्ताहिक दिल्ली डायरी का यह अंक आपको कैसा लगा? लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर).