गुरुवार, 27 जुलाई, 2006 को 05:03 GMT तक के समाचार
कमोडोर सी उदय भास्कर
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ
असैनिक परमाणु समझौता हो जाने के बाद अमरीका ने भारत के खिलाफ़ जो तकनीकी और परमाणु व्यापार पर पाबंदियाँ लगा रखी हैं वो हट जाएँगी और दोनों देशों के बीच सामरिक-राजनैतिक रिश्तों की नई रुपरेखा तय होगी.
भारत ने 1974 में परमाणु परीक्षण किया था जिसके बाद अमरीका ने ये पाबंदियाँ लगाई थी. इन 32 सालों में इस पाबंदी से दोनों देशों के रिश्तों में एक तरह का नकारात्मक असर पड़ा.
अब इसमें बदलाव आने की आशा है.
ये समझौता भारत और अमरीका दोनों देशों के हित में है.
यह एक ग़लतफ़हमी है कि समझौते से भारत के परमाणु कार्यक्रमों में अमरीका या अन्य देशों की दखल बढ़ेगी.
अगर आप 18 जुलाई (2005) और इस वर्ष दो मार्च को भारत और अमरीका के साझा बयान की विस्तार से समीक्षा करें तो कहीं नहीं लगता कि भारत के सामरिक कार्यक्रमों पर कोई दबाव पड़ रहा है.
केवल एक बात भारत ने स्वीकार किया है और वो है परमाणु प्रतिष्ठानों को सैनिक और असैनिक हिस्सों में बाँटने का. मैं मानता हूँ कि यह भी एक अच्छा क़दम है.
कुछ लोग कहते हैं कि इस समझौते से परमाणु अप्रसार पर असर पड़ेगा तो ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत वर्षों से एक जवाबदेह और संयमित परमाणु शक्ति रहा है.
ये कहना भी सही नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच हथियारों की होड़ बढ़ेगी. 'आर्म्स रेस' का ज़ुमला शीत युद्ध के साथ जुड़ा हुआ है.
वर्ष 1998 में भारत और पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किए थे. अब पिछले आठ सालों में दोनों देशों में एक तरह का संतुलन दिखाई दे रहा है.
हालांकि पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम को यूरेनियम के बदले प्लूटोनियम आधारित बनाने की कोशिश कर रहा है.
एक बात मैं ज़रुर कहूँगा कि अगर भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु कार्यक्रमों में पारदर्शिता बरतें तो दक्षिण एशिया में परमाणु स्थिरता क़ायम की जा सकती है बाद में इसमें चीन को भी शामिल किया जा सकता है.