बुधवार, 26 जुलाई, 2006 को 03:13 GMT तक के समाचार
अमित उपाध्याय
बीबीसी, मुंबई
मुंबई. 25 जुलाई, मंगलवार. ठीक पंद्रह दिन पहले वह भी मंगलवार की एक शाम थी जो महज़ 10 मिनट में एक न भूलने वाली रात में तब्दील हो गई.
मुंबई के पश्चिम की ओर जाने वाली लोकल ट्रेनों में शाम 6.24 से 6.35 के बीच एक के बाद एक सात बम विस्फोटों ने लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी वाले मुंबई में अफ़रा-तफ़री मचा दी.
मैंने शाम को वही लोकल ट्रेन पकड़ी जिसमें 15 दिनों पहले पहला ब्लास्ट हुआ था.
चर्च गेट स्टेशन पर गाड़ी खचाखच भरी हुई थी. मैंने प्रथम श्रेणी के एक डिब्बे में एक सीट पकड़ ली.
लोकल ट्रेन के चर्च गेट स्टेशन से निकलने से पहले और शुरुआती पाँच-छह मिनट की यात्रा में मुझे लग रहा था कि मुंबई सामान्य हो गई है और मुंबईवासी 15 दिनों पहले के हादसे को भुला चुके हैं.
लेकिन अचानक ही लगा कि मेरी सोच ग़लत थी.
मेरे सामने बैठे एक 58 वर्षीय गुजराती बुज़ुर्ग के घर से यह पूछने के लिए फ़ोन आ गया कि उन्होंने घर आने के लिए कौन सी ट्रेन पकड़ी है.
पास ही बैठे दूसरे सज्जन बोल पड़े कि जब तक वे घर नहीं पहुँच जाते चार-पाँच फ़ोन तो घर से आ ही जाते हैं.
बातों ही बातों में 14 जुलाई के हादसों की चर्चा शुरु हो गई.
वहाँ बैठे सभी लोगो के माथे पर शिकन साफ़ दिखाई दे रही थी.
घटना बयान करते हुए कुछ लोग अचानक उत्तेजित भी हो गए. बातों-बातों में ट्रेन माटुँगा स्टेशन तक पहुँच गई जहाँ मौत का तांडव हुआ था.
एकाएक ही चर्चा थम गई.
कुछ लोग वहाँ ऐसे थे जो उस दिन के विस्फोट के चश्मदीद थे. वे धीमी आवाज़ में बयान करते रहे कि उस दिन क्या हुआ था.
मैं भी माटुंगा स्टेशन पर उतर गया.
एक बात साफ़ थी कि दौड़ती भागती ज़िंदगी में मुंबईवासी ख़ुद को कितना भी मशगूल करने की कोशिश करें और दूर से देखने वालों को ज़िंदगी कितनी ही सामान्य होती सी लगे लेकिन हक़ीकत यही है कि घटना मुंबईवासियों के रुह को छू गई है.
उस हादसे का दर्द आसानी से दूर होने वाला नहीं है.