सोमवार, 17 जुलाई, 2006 को 12:22 GMT तक के समाचार
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण गिराने पर रोक के लिए नया क़ानून लाने पर केंद्र सरकार को फटकार लगाई है.
दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में क़रीब 18000 अवैध इमारतों को तोड़ने का आदेश दिया था.
इसके मद्देनज़र दिल्ली सरकार ने अवैध रूप से बने और बनाए जा रहे ढाँचों को गिराने और उन्हे सील करने की मुहिम शुरू की जिसका व्यापारियों ने कड़ा विरोध किया.
विरोध तेज़ होने के बाद केंद्र सरकार ने कारोबारियों को राहत देते हुए नए क़ानून के तहत तोड़फोड़ की कार्रवाई पर एक वर्ष को लिए रोक लगा दिया था.
स्पष्टीकरण
इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक हफ़्ते के भीतर नया क़ानून लाने पर स्पष्टीकरण देने को कहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने अदालती फ़ैसलों को पलटने की सरकारी कोशिशों पर गंभीर चिंता जताई.
अदालत ने कहा, "इस तरह के क़ानून गंभीर चुनौती हैं. पहले आप छह महीने का समय मांगते हैं. फिर अपनी ही याचिका वापस लेकर नया क़ानून बनाते हैं. हमें नहीं पता कि क्या यह सरकार की रणनीति का हिस्सा है."
केंद्र सरकार के नए कानून के ख़िलाफ़ गैर सरकारी संगठन सिटिज़न्स फ़ोरम ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.
इस याचिका में कहा गया है कि नए क़ानून से अदालती फ़ैसले का मक़सद ही ख़त्म हो गया है.
हाईकोर्ट का आदेश
इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध निर्माण हटाने का आदेश देते हुए कहा था कि इससे सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सेवाओं पर अनावश्यक दबाव पड़ता है.
हाईकोर्ट ने कहा था कि अधिकतर अवैध निर्माण बिल्डरों और अधिकारियों की मिलीभगत का नतीजा है.
दिल्ली में पहले भी अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ अभियान चलाए गए हैं लेकिन इनके निशाने पर अधिकतर झुग्गी-बस्ती के लोग रहते थे.
पिछले वर्ष ऐसा पहली बार हुआ जब अदालती आदेश के बाद पॉश कहे जाने वाले रिहायशी इलाक़ों में भी अधिकारियों ने बुलडोजर चलाए.