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अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पाँव पसार रहा है भ्रष्टाचार

हाल में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सालाना 210 अरब रुपए रिश्वत में दिए जाते हैं.

एशिया के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत नौवें स्थान पर है तो विश्व के 158 देशों की सूची में भारत 88वें स्थान पर है.

भारत में भ्रष्टाचार की चर्चा जितनी चाहे हो चुकी हो फिर भी ये आंकड़े चौंका देते हैं. सुन कर लगता है मानो पूरे देश ने भ्रष्टाचार के सामने घुटने ही टेक दिए हों.

समाजशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार मानते हैं कि काले धन की इससे कहीं ज्यादा विकराल है.

उनका कहना है कि 1995 में अनुमान लगाया गया था कि सार्वजनिक क्षेत्र में 55 हज़ार करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार की वजह से नुक़सान हो जाता है.

अगर ये आंकड़े सही हैं तो यह भी सही है कि जितनी रिश्वत दी जाती है उसे अगर विकास के कार्यों में लगाया जाए तो देश के पिछड़े इलाकों का नक़्शा बदल सकता है.

अगर यह रक़म ग़रीबों में बांट दी जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर ग़रीबों की संख्या मौजूदा संख्या के आधी रह जाएगी.

विकट समस्या

अगर एक समस्या के हल से इतनी समस्याएं हल हो सकती हैं तो क्या वजह है कि इसकी रोकथाम नहीं हो पाती. क्यों फलफूल रहा है भ्रष्टाचार भारत में.

ट्रांसपेरंसी इंटरनेशनल संस्था से जुड़े मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व मु्ख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर धर्माधिकारी कहते हैं कि हम इसके प्रति इतने उदासीन हो गए हैं कि भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है.

मगर भ्रष्टाचार क्या देश की सांस्कृतिक सच्चाई बन गया है या इसके दूसरे कारण भी हैं.

प्रोफेसर अरुण कुमार मानते हैं कि देश में लोकतंत्र की परिपक्वता की कमी की वजह से भ्रष्टाचार फैल रहा है.

ज़ाहिर सी बात है लोकतंत्र की जड़ें और कमज़ोर करने में भी भ्रष्टाचार की बड़ी भूमिका होती है.

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 40 प्रतिशत न्यायिक मामल रिश्वत के बल पर प्रभावित किए जाते हैं और भ्रष्ट सरकारी तबकों में पुलिस सबसे ऊपर है.

यह समझने के लिए किसी अर्थशास्त्री की ज़रूरत नहीं है की ग़रीबों का एक सबसे बड़ा दुश्मन भ्रष्टाचार ही है जो उसे रोटी से, अवसरों से और अधिकारों से दूर रखता है.

सूचना के अधिकार जैसे क़ानूनों से कुछ मदद तो मिलेगी लेकिन भ्रष्टाचार के निर्मूलन के लिए शायद सामाजिक परिवर्तन चाहिए.