शनिवार, 01 जुलाई, 2006 को 09:17 GMT तक के समाचार
गुजरात की एक पोटा अदालत ने अक्षरधाम मंदिर पर हमले के मामले में तीन अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा सुनाई है. अदालत ने इस मामले में कुल छह लोगों को दोषी करार दिया है.
सुरक्षा कारणों से साबरमती जेल के अंदर मामले की सुनवाई कर रही विशेष पोटा अदालत ने शनिवार को यह फ़ैसला सुनाया.
चाँद ख़ान, अब्दुल क़यूम और आदम अज़मेरी को फाँसी की सज़ा सुनाई गई है जबकि मोहम्मद सलीम को आजीवन कारावास की सजा दी गई है.
मुफ़्ती अब्दुल्ला मियाँ को 10 वर्ष और अल्ताफ़ हुसैन मलिक को पाँच वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई है.
बचाव पक्ष
अदालत में अभियुक्तों की ओर से बहस कर रहे वकील एचएन झाला ने कहा कि पोटा अदालत का यह फैसला गुजरात उच्च न्यायालय की मंज़ूरी के बाद ही प्रभावी होगा.
क्योंकि अग़र निचली अदालतें फाँसी की सजा सुनाती हैं तो इस पर उच्च न्यायालय का मुहर लगना ज़रूरी हो जाता है. झाला ने कहा कि वे उच्च न्यायालय में अपने मुवक्किलों का पक्ष रखेंगे.
पोटा अदालत में सभी छह अभियुक्तों पर आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत मामला चला जिसमें उन पर हत्या, षडयंत्र और हमलावरों को साजो-सामान मुहैया कराने का आरोप लगाया गया था.
इस मामले में कुल 34 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए गए थे जिनमें 26 अभी भी फ़रार हैं और दो की मौत हो चुकी है.
पुलिस के मुताबिक चार अभियुक्त पाकिस्तान और सऊदी अरब भाग चुके हैं. पुलिस ने अदालत को बताया है कि इन अभियुक्तों में से किसी का पासपोर्ट या फोटो उनके पास नहीं है, इसलिए इन्हें वापस लाना मुश्किल है.
हमला
24 सितंबर 2002 में गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर में सेना की वर्दी पहने दो हथियारबंद चरमपंथी दाखिल हुए और ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरु कर दी.
इस हमले में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी के दो जवानों समेत 33 लोग मारे गए थे और 81 अन्य घायल हुए.
एनएसजी के साथ रात भर चली मुठभेड़ में दोनों चरमपंथी मारे गए. बाद में इनकी पहचान मुर्तज़ा हाफ़िज़ यासीन और अशरफ अली मोहम्मद फ़ारूक़ के रुप में हुई. पुलिस के मुताबिक़ दोनों पाकिस्तानी नागरिक थे.
अधिकारियों के मुताबिक़ यह हमला चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के इशारे पर किया गया था.
अक्षरधाम मंदिर का संचालन अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्थान करता है जो अपने सुंदर स्थापत्य कला के लिए विख्यात है.
हर वर्ष लगभग 20 लाख सैलानी गांधीनगर स्थित इस मंदिर की यात्रा करते हैं. यह मंदिर 19 वीं सदी के हिंदू संत स्वामीनारायण के अनुयायियों ने बनवाया है.