|
'ताबूत घोटाले' में मामला दर्ज हुआ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने अमरीका से सेना में इस्तेमाल करने के लिए अल्यूमिनियम के कुछ ताबूत और शव रखने वाले थैले ख़रीदने के एक मामले में कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और अमरीका के एक ठेकेदार के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है. सीबीआई ने शुक्रवार को एक विज्ञप्ति में कहा है कि यह मामला एक मेजर जनरल (हाल ही में सेवानिवृत्त), दो कर्नल रैंक के एक अधिकारी, अमरीका के एक ठेकेदार और कुछ अन्य लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया है. मेजर जनरल रैंक का यह अधिकारी उस ख़रीद ठेके के समय अमरीका में भारतीय दूतावास में मिलिटरी अटैची था. उनके अलावा कर्नल रैंक का एक अधिकारी मास्टर जनरल ऑर्डनेंस (एमजीओ) में निदेशक था और एक अन्य कर्नल संयुक्त निदेशक. सौदे की प्रारंभिक जाँच के बाद इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ ये मामले दर्ज किए गए हैं. भारत के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका की एक कंपनी से अल्युमिनियम के ताबूत और शव थैले ख़रीदे थे और उनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों के शव सम्मानजनक तरीके से घर पहुँचाने के लिए किया जाना था. लेकिन इन संदिग्ध अधिकारियों ने 1999-2000 के दौरान ऐसे 500 अल्यूमुनियम ताबूत और 3000 शव थैले ख़रीदने के लिए अमरीका की एक कंपनी के साथ जो सौदा किया उसमें प्रति ताबूत 2500 अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक लाख बीस हज़ार रुपए और शव थैलों के लिए 85 अमरीकी डॉलर प्रति थैला के हिसाब से भुगतान किया गया जो की बहुत बढ़ी हुई दर थी. यह सौदा कुल 15 लाख और पाँच हज़ार अमरीकी डॉलर यानी क़रीब सात करोड़ रुपए का था. यह पाया गया है कि जिस अमरीकी कंपनी के साथ यह सौदा हुआ वह इन ताबूतों और शव थैलों की निर्माता कंपनी नहीं थी और उसने पहले जो 150 ताबूत सप्लाई किए उनका वज़न 55 किलोग्राम प्रति ताबूत था जबकि सौदे के हिसाब से 18 किलोग्राम होना चाहिए था. घटिया माल प्रारंभिक जाँच में यह भी पाया गया है कि ताबूतों के साथ वैल्डिंग के ज़रिए छेड़छाड़ हुई जिसकी वजह से उसमें सुराख़ होने का ख़तरा था और इसी वजह से वे ताबूत इस्तेमाल के योग्य नहीं पाए गए. इस तरह सरकार को एक लाख 87 हज़ार अमरीकी डॉलर यानी क़रीब 89 लाख 76 हज़ार रुपए का घाटा हुआ.
यह भी पता चला है कि इसी तरह के अल्यूमिनियम ताबूत और शव थैले सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन को 172 अमरीकी डॉलर प्रति ताबूत और 27 डॉलर प्रति थैले की दर से सप्लाई किए गए थे. अभियुक्त अधिकारियों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने सिर्फ़ एक ही कंपनी से सामान ख़रीदा और अलग-अलग कंपनियों से क़ीमत जानकर सौदा करने के सामान्य नियम की अनदेखी की. हालाँकि कारगिल युद्ध के माहौल में ताबूतों और शव थैलों का कुछ अतिरिक्त भंडार जमा किया गया था लेकिन सौदे के अनुसार इस सामान की पहली खेप काफ़ी देर से पहुँचने वाली थी. इन अधिकारियों ने घटिया सामान की आपूर्ति को सफल बनाने के इरादे से इनकी गुणवत्ता के विवरण में भी फेरबदल की और फिर उन घटिया ताबूतों और शव थैलों को सेना में इस्तेमाल कराने के लिए भी कोशिश की. कारगिल युद्ध के बाद विपक्षी कांग्रेस ने आयात में घपले का आरोप लगाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीज़ के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाया था. हालाँकि दो साल पहले कांग्रेस ने एक जाँच शुरू की थी जिसमें फ़र्नांडीज़ को क्लीन चिट दे दी थी. | इससे जुड़ी ख़बरें करगिल विधवाओं का मामला कोर्ट में06 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस करगिल मामले में जाँच से इनकार 19 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस 'समय लगने से नहीं हुई अधिक मौतें'09 जून, 2004 | भारत और पड़ोस करगिल मुद्दा फिर गरमाया06 जून, 2004 | भारत और पड़ोस हंगामेदार रहा मॉनसून सत्र | भारत और पड़ोस राज्यसभा में फिर हंगामा | भारत और पड़ोस करगिल पर संसद में हंगामा | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||